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सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ तीन पुनर्विचार याचिका

नई दिल्ली, 08 अक्टूबर (उदयपुर किरण). सुप्रीम कोर्ट द्वारा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक करार देने के फैसले के खिलाफ तीन पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) दायर की गई है. एक याचिका नेशनल अयप्पा डिवोटी एसोसिएशन ने दायर की है. दूसरी याचिका नैयर सर्विस सोसायटी ने जबकि तीसरी याचिका कंशियस ऑफ वुमन ने दायर की है.

नेशनल अयप्पा डिवोटी एसोसिएशन की ओर से वकील मैथ्यूज नेदूम्पारा के जरिये दायर याचिका में कहा गया है कि जो महिलाएं आयु पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आईं थीं, वे अयप्पा भक्त नहीं हैं. ये फैसला लाखों अयप्पा भक्तों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं और इस फैसले को वापस लिया जाना चाहिए.

नैयर सर्विस सोसायटी की ओर से केवी मोहन द्वारा दायर रिव्यू पिटीशन में कहा गया है कि संविधान पीठ का 28 सितंबर का फैसला सही नहीं है. याचिका में कहा गया है कि न तो कोर्ट और न ही विधायिका एक धर्म या अभ्यास या पंरपरा या विश्वास में बदलाव का आदेश दे सकती है. याचिका में कहा गया है कि यंग लॉयर्स एसोसिएशन केवल एक तीसरा पक्ष है.

कंशियस ऑफ वुमन की याचिका में कहा गया है कि सबरीमाला देवता के भक्त कोई अलग नहीं हैं. याचिका में कहा गया है कि किसी भी धार्मिक विश्वास या प्रथाओं को चुनौती देने के लिए ये फैसला “दरवाजा खोलता” है.

उल्लेखनीय है कि 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 4-1 के बहुमत से सबरीमाला के मामले में फैसला सुनाया था. कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है. महिला पुरुष से कमतर नहीं है. एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरूप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं. कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत चार जजों ने कहा था कि ये संविधान की धारा 25 के तहत मिले अधिकारों के विरुद्ध है.

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बाकी चार जजों के फैसले से अलग फैसला सुनाया था. उन्होंने कहा था कि धार्मिक आस्था के मामले में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए. उन्होंने कहा था कि पूजा में कोर्ट का दखल ठीक नहीं है. मंदिर ही यह तय करे कि पूजा का तरीका क्या होगा. मंदिर के अधिकार का सम्मान होना चाहिए. उन्होंने कहा था कि धार्मिक प्रथाओं को समानता के अधिकार के आधार पर पूरी तरह से परखा नहीं जा सकता है. यह पूजा करने वालों पर निर्भर करता है न कि कोर्ट यह तय करे कि किसी के धर्म की प्रक्रिया क्या होगी. जस्टिस मल्होत्रा ने कहा था कि इस फैसले का असर दूसरे मंदिरों पर भी पड़ेगा.

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