Wednesday , 12 December 2018
बुधवार से शुरू होगी नवरात्रि, बनेंगे कई शुभ योग

बुधवार से शुरू होगी नवरात्रि, बनेंगे कई शुभ योग

नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रि का पर्व बुधवार, 10 अक्टूबर को घट स्थापना के साथ शुरू हो जाएगा. 9 दिनों तक चलने वाले इस पर्व के दौरान कई शुभ योग बनेंगे. तिथियों के घट-बढ़ होने के बाद भी नवरात्रि पूरे नौ दिनों तक चलेगी. नवरात्रि की शुरुआत चित्रा नक्षत्र में होगी, जबकि समापन श्रवण नक्षत्र में होगा. इसके अलावा नवरात्रि में दो गुरुवार आएंगे. इसे ज्योतिष के जानकार शुभ मानते हैं.

भोपाल के ज्योतिष संस्थान मठ के ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद गौतम ने बताया कि इस बार नवरात्रि के दौरान तिथियों में घट-बढ़ होगी. इसके बावजूद नवरात्रि पूरे नौ दिन मनाई जाएगी. बुधवार, 10 अक्टूबर को प्रतिपदा और द्वितीया तिथि एक साथ पड़ेंगी. इसलिए पहले दिन शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के दो स्वरूपों शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी. 13 और 14 अक्टूबर को पंचमी तिथि दो दिन रहेगी और इस दिन स्कंदमाता का पूजन का विधान है. इसीलिए नवरात्रि का पर्व पूरे नौ दिन का होगा. उन्होंने बताया कि इस बार नवरात्रि की शुरुआत चित्रा नक्षत्र में होकर समाप्ति श्रवण नक्षण में होगी.

पर्व के दौरान राज, अमृत और सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहे हैं और दो गुरुवार होने से नवरात्रि का पर्व लोगों के लिए सुख-समृद्धि दायक रहेगा. ज्योतिषिचार्य पंडित विनोद गौतम के मुताबिक, बुधवार 10 अक्टूबर को प्रतिपदा तिथि ब्रह्म मुहूर्त से सुबह 7.49 बजे तक रहेगी और इसके बाद द्वितीया तिथि शुरू हो जाएगी. इसीलिए घट स्थापना सुबह 7.49 बजे से पहले करना शुभ रहेगा. हालांकि, दो तिथियां एक-साथ आ रही हैं. इसलिए बाद में घट स्थापना हो सकती है. लेकिन घट स्थापना का श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 06.42 से 7.49 बजे से तक रहेगा. इसके बाद अन्य मुहूर्त चर-अचर-लाभ-अमृत आदि मुहूर्तों में श्रद्धालु घटस्थापना कर सकते हैं.

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद गौतम ने बताया कि नवरात्रि में लोग सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए व्रत रखकर नौ दिनों तक मां भवानी की पूजा-अर्चना करते हैं. इससे उन्हें धन-धान्य की प्राप्ति होती है. उन्होंने बताया कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के अलग-अलग नौ रूपों का नौ दिनों तक पूजन किया जाता है. पहले दिन देवी पार्वती के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा होती है, जिनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है. पर्वतराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है. इनके पूजन से भक्तों को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं.

नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप के पूजन का विधान है. इनके एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में तप की माला है. इन्होंने भगवान भोलनाथ को पति के रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक घोर तपस्या थी. इसीलिए इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया है. इनका स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय है. इनकी उपासना से साधक को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है. तीसरे दिन शक्ति देवी चंद्रघटा की पूजा होती है. दस भुजाओं वाली इन देवी के प्रत्येक हाथ में अलग-अलग शस्त्र हैं और इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है. इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है. इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. इनकी आराधना से भक्तों को लम्बी उम्र के साथ, सुख-संपन्नता की प्राप्ति होती है.

नवरात्रि के चौथे दिन शेर पर सवार अष्ट-भुजाओं वाली देवी कूष्माण्डा स्वरूप की पूजा होती है. इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष-वाण, कमलपुष्प, अमृतकलश, चक्र, गदा और जप माला सुशोभित हैं. धर्मग्रंथों के अनुसार इन्होंने अपनी मंद हल्की हंसी से ब्रह्मांड की रचना की थी. इसीलिए इन्हें कूष्मांडा देवी कहा गया. इनके पूजन से व्यक्ति को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं. पांचवें दिन पद्मासन देवी स्वरूपा मां स्कंदमाता के पूजन का विधान है. सिंह पर सवार शुभ्र वर्ण देवी स्कंदमाता भगवान स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में उठाए और दाएं हाथ में कमल पुष्प लिए हुए हैं. भगवान स्कंद की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा गया है. इनकी आराधना से साधनों को आरोग्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है.

नवरात्रि के छठवें दिन मां के कात्यायनी स्वरूप की पूजा होती है. शेर पर सवार मां की चार भुजाएं हैं. इनके बाएं हाथ में कमल और तलवार व दाएं हाथों में स्वास्तिक व आशीर्वाद की मुद्रा अंकित है. देवताओं और ऋषियों के कार्य को सिद्ध करने के लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट होने से इनका नाम कात्यायनी पड़ा. इनकी आराधना से गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है. सातवें दिन मां के कालरात्रि स्वरूप के पूजन का विधान है. इनके तीन नेत्र और चार हाथ हैं, जिनमें एक में तलवार है तो दूसरे में लौह अस्त्र तथा तीसरा हाथ अभय मुद्रा में है, चौथा हाथ वर मुद्रा में है. गर्दभ पर सवार मां का वर्ण एकदम काला तथा बाल बिखरे हुए हैं. धर्मग्रंथों में इन्हें आसुरी शक्तियों का विनाश करने वाली देवी बताया गया है. इनके नाम के उचारण से ही भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं. इनकी अराधना से भक्तों की व्याधियां दूर होती है और शत्रुओं से छुटकारा मिलता है.

आठवें दिन मां के शक्ति महागौरी स्वरूप का पूजन होता है. बैल पर सवार मां महागौरी का स्वरूप अत्यंत उज्जवल और श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं. इन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कड़ी तपस्या की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ गया था. तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने इनके शरीर के गंगाजल से धोया, तो वह विद्युत प्रभा के समान कांतिमान-गौर हो गया. इसीलिए इन्हें महागौरी कहा गया. इनके पूजन से लोगों को धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. नौवें दिन मां के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा होती है.

कमल पर आसीन देवी के हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं. मां सिद्धिदात्री सरस्वती का भी स्वरूप माना गया है. भगवान शिव की कृपा से इनको सभी शक्तियां प्राप्त हैं. शिव की पूजा इनके बिना अधूरी मानी जाती है, क्योंकि भगवान शिव का आधा शरीर मां सिद्धिदात्री को प्राप्त हुआ है और इसीलिए भगवान भोलेनाथ अर्धनारीश्वर के नाम से भी जाने जाते हैं. बताते हैं कि सभी देवी-देवताओं को भी मां सिद्धिदात्री से ही सिद्धियां प्राप्ति हुईं. इनके पूजन से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

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