Friday , 14 December 2018
सती के त्याग का गवाह माया देवी शक्तिपीठ

सती के त्याग का गवाह माया देवी शक्तिपीठ

हरिद्वार, 09 अक्टूबर (उदयपुर किरण). पौराणिक नगरी हरिद्वार के कण-कण में देवताओं का निवास कहा गया है. हरिद्वार की उपनगरी कनखल एक मात्र ऐसा स्थान है, जहां तैंतीस कोटि देवता पधारे थे. पं. प्रदीप जोशी के अनुसार, सप्तपुरियों में से एक इस नगरी को विश्व के शक्तिपीठों का उद्गम स्थान भी कहा जाता है. यह वही स्थान हैं जहां माता सती ने योगाग्नि से अपनी देह को भस्म किया था और उनके शरीर के भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा 51 टुकड़े करने के कारण ही जहां-जहां माता सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई. मायानगरी के नाम से पुराणों में विख्यात हरिद्वार में भी एक शक्तिपीठ है जो सती के त्याग की गवाह है.

इस शक्तिपीठ में माता सती की नाभि गिरी थी. इस कारण इसे माया देवी के नाम से जाना जाता है. यही कारण है कि पुराणों में हरिद्वार का जिक्र मायापुरी के नाम से आता है. देवनगरी हरिद्वार में पतित पावनी गंगा भक्तों के पाप धोती है. शिव की जटाओं से निकली मोक्षदायिनी गंगा के स्पर्श से महाकुंभ की इस नगरी का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है. मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश यहां वास करते. पौराणिक मान्यता के अनुसार जब सती ने अपने पिता के यज्ञ में अपने पति को नहीं बुलाए जाने से अपमानित होने पर अपनी देह को योगाग्नि से भस्म कर लिया था. और अपने शरीर को सतीकुंड पर छोड़कर महामाया रूप में हरिद्वार के इसी स्थान पर आ गई थीं.

इसीलिए इस जगह का नाम मां मायादेवी पड़ा. माया देवी को हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जिसका इतिहास 11 शताब्दी से उपलब्ध है. प्राचीन काल से माया देवी मंदिर में देवी की पिंडी विराजमान है और 18वीं शताब्दी में इस मंदिर में देवी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई. हरिद्वार में भगवती की नाभि गिरी थी, इसलिए इस स्थान को ब्रह्मांड का केंद्र भी माना जाता है. हरिद्वार की रक्षा के लिए एक अद्भुत त्रिकोण शक्त्पिीठ भी यहां विद्यमान है. इस त्रिकोण शक्तिपीठ के दो बिंदु पर्वतों विल्व व नील पर मां मनसा और मां चंडी स्थित हैं तो वहीं त्रिकोण का शिखर धरती की ओर है और उसी अधोमुख शिखर पर भगवती माया आसीन हैं. मां के इस दरबार में मां माया के अलावा मां काली और देवी कामाख्या के दर्शनों का भी सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है.

जहां मां काली देवी माया के बायीं ओर तो वहीं दाहिंनी ओर मां कामाख्या विराजमान हैं. मां माया देवी मंदिर के साथ ही भैरव बाबा का मंदिर भी मौजूद है. मान्यता है कि मां की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त भैरव बाबा का दर्शन पूजन कर उनकी आराधना नहीं की जाती..मां माया देवी के पीठ पर शाम ढले हजारों लाखों भक्त मां के दर्शन करने, उनकी आरती में शामिल होने के लिए घंटों इंतजार करते हैं. वैसे तो प्रतिदिन यहां श्रद्धालुओं को तांता लगा रहता है, किन्तु नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है.

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