Wednesday , 12 December 2018
अमेरिका से सौगात में मिली थी गाजर घास, अब बिगाड़ रही सेहत

अमेरिका से सौगात में मिली थी गाजर घास, अब बिगाड़ रही सेहत

-अमेरिकन गाजर घास से बुन्देलखण्ड समेत भारत में मंडराया खतरा
-1960 के दशक में भारत को अमेरिका से आयी थी लाखों टन घास
-हरित क्राँति के समय गेहूँ के साथ पारथ्रेनियम से भारत का हर हिस्सा प्रभावित
– घास के पराग कण हवा में उड़कर मनुष्यों व जानवरों को दे रहे गंभीर रोग
– सौगात में मिली गाजर घास से निजात पाने के सभी उपायों पर लगा ग्रहण

हमीरपुर, 10 अक्टूबर (उदयपुर किरण). बुन्देलखण्ड सहित पूरे भारत में जहाँ झमाझम बारिश से भूगर्भ जलस्तर बढ़ा है वहीं खेतों व खुले मैदानों पर बड़े पैमाने पर पारथ्रेनियम हिस्टोरेसफोरस (गाजर घास) लहरा जाने से अब यहाँ आम लोगों के स्वास्थ्य पर खतरे के बादल मंडरा गये हैं.
इस पारथ्रेनियम के पराग कण से ब्रान्कल अस्थमा, एलर्जी व श्वास सम्बन्धी अनेकों रोगों ने पाँव पसार लिये है. हमीरपुर के कृषि वैज्ञानिक डा.एसपी सोनकर ने इस घास को लेकर चिंता जताई है.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1960 के दशक में भारत में खाद्यान्न के लाले पड़े गये थे तब तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका से मदद माँगी थी. अमेरिका ने भारत को लाखों टन गेहूँ देने की डील कर दी थी. बताया जाता है कि भारत में खाद्यान्न की कमी को पूरा करने के लिये अमेरिका से भारी मात्रा में गेहूँ का आयात तो हुआ मगर गेहूँ के साथ पारथ्रेनियम के बीज भी भारत को सौगात के रुप में ऐसे मिल गये कि इसे लेकर भारत आज भी खामियाजा भुगत रहा है. गेहूँ देकर अमेरिका की मंशा पर भी लोग सवाल कर रहे हैं कि अमेरिका ने भारत की मदद की या फिर उसे आर्थिक रुप से कमजोर करने के लिये जानबूझकर गेहूँ के साथ खतरनाक बीमारी के बीज भेजे थे.

गुजरे पाँच दशकों में भारत का कोई भी ऐसा क्षेत्र अछूता नहीं रहा जहाँ यह पारथ्रेनियम ने पांव पसार न लिये हो. जानकारों की मानें तो इस गाजर घास के फैलाव को रोकने के लिये कृषि वैज्ञानिकों द्वारा तमाम उपाय किये गये मगर सारे उपाय हवा में उड़ गये. आज भी कृषि वैज्ञानिकों के लिये पारथ्रेनियम शोष का विषय बना हुआ है. माना जाता है कि इस गाजर घास से हमीरपुर ही नहीं पूरे प्रदेश और भारत में श्वास सम्बन्धी रोगों की गिरफ्त में आ चुके है. स्वास्थ्य विभाग के डाक्टर भी पारथ्रेनियम से होने वाली श्वास सम्बन्धी बीमारियों को न सिर्फ खतरनाक मानते है बल्कि पारथ्रेनियम के पौधों से दूर रहने की सलाह भी देते है. यह ऐसे पौधे है जिन्हें मवेशी भी खाने से परहेज करते है. बारिश के दौरान तो बुन्देलखण्ड के हमीरपुर जिले में हर जगह यह पौधे लहरा गये है जिसके पराग कण जरा सी हवा चलते ही उड़कर स्वस्थ मनुष्यों के श्वसन तंत्र को प्रभावित कर देती है. विश्व प्रकृति निधि भारत की बुन्देलखण्ड इकाई में वर्ष 1990 के दशक में सेवायें दे चुके जलीस खान का का कहना है कि जहाँ भी इस प्रकार के पौधे दिखायी दे तो उन्हें उखाड़कर जला देना चाहिये हालांकि स्थायी तौर पर यह समस्या का हल नहीं है इसके बावजूद अस्थायी तौर पर यह प्रयास तो किये ही जा सकते है.

उन्होंने कहा कि हमीरपुर, जालौन, बांदा, चित्रकूट, झांसी, ललितपुर, कानपुर नगर, फतेहपुर, उन्नाव, इटावा, इलाहाबाद, रायबरेली, हरदोई, बाराबंकी, और प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलावा मध्यप्रदेश का हर भूभाग इन दिनों खतरनाक पारथ्रेनियम पौधों से लहरा गया है. उनका मानना है कि पारथ्रेनियम पौधे से आच्छादित इलाकों में जाने से पहले लोगों को अपने मुंह व नाक में रुमाल लगा ले क्योंकि हवा में इन पौधे से जो पराग कण उड़ते है वह सीधे नाक के रास्ते फेफड़े में पहुंच जाते है. कृषि वैज्ञानिकों ने इस खतरनाक घास को लेकर एक जन जागरूकता अभियान का आगाज करने के साथ इसे उखाड़ फेंकने के लिये सड़क पर आ गये है.

पर्यावरण व जैव विविधता के लिये दुश्मन है गाजर घास

हमीरपुर के कृषि वैज्ञानिक डा.एस.पी.सोनकर ने बुधवार को सुबह गाजर घास के दुष्प्रभाव को लेकर चिंता जताते हुये माना कि यह मनुष्यों व जानवरों के स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा है. और तो और जैव विविधता एवं पर्यावरण के लिये भी यह गाजर घास दुश्मन है जो धीरे-धीरे दुष्प्रभाव छोड़ रही है. उन्होंने बताया कि पार्कों, खेेतों, रेलवे लाइनों के किनारे, मार्गों व सामुदायिक तथा परती भूमि को भी इस खतरनाक घास ने अपनी चपेट में ले लिया है जिससे अब फसलों को इसके दुष्प्रभाव से झटका लग रहा है.

कृषि वैज्ञानिक डा.शालिनी ने बताया कि हरित क्रांति के समय अमेरिका से गेहूं के साथ गाजर घास भारत आ गयी जो मौजूदा में जैव विविधता एवं पर्यावरण के लिये गंभीर खतरा बन गयी है. उन्होंने कहा कि जाइक्रोडर्मा बाइक्रोरायट्रा नामक रसायन से ही इस खतरनाक घास से निजात पायी जा सकती है. यह रसायन भी खरपतवार विज्ञान अनुसंधान निदेशालय महाराजपुर जबलपुर (म.प्र.) से मंगायी जा सकती है. कृषि वैज्ञानिक ने कहा कि गाजर घास को कांग्रेस घास भी कहा जाता है जिसके एक बीज से डेढ़ से दो हजार पौधे उग आते है. कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि आम लोगों के स्वास्थ्य के लिये खतरनाक बनी गाजर घास को फूल आने से पहले सामूहिक रूप से उखाड़कर जमीन में दफन किया जाये तो काफी हद तक इससे किसान निजात पा सकता है. इस घास के दुष्प्रभाव से किसानों की फसलों को काफी नुकसान हो रहा है.

गाजर घास से बढ़ रही श्वास संबन्धी बीमारी

जिला सरकारी अस्पताल के वरिष्ठड्ढ फिजीशियन डा.पी.के.गुप्ता ने बताया कि गाजर घास बहुत ही खतरनाक है जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग एलर्जी, त्वचा, अस्थमा तथा अन्य श्वास सम्बन्धी बीमारी की चपेट में आ रहे है. इन डाक्टरों का कहना है कि उनके यहां इस तरह प्रतिदिन बीस से पच्चीस मरीज इलाज कराने आते है. उन्होंने बताया कि पूरा हमीरपुर क्षेत्र इस गाजर घास के कारण एलर्जी जैसे ही बीमारी की चपेट में है. होम्योपैथिक चिकित्सक डा.कुंवर सिंह पवार ने बताया कि उनके यहां दर्जनों लोग श्वास सम्बन्धी बीमारी से पीड़ित होकर इलाज कराने आते है. पिछले एक साल के अन्दर ही कम से कम दो हजार मरीज गाजर घास के दुष्प्रभाव से इलाज कराने आये इनमें त्वचा सम्बन्धी रोगियों की भी बड़ी संख्या शामिल है.

उन्होंने बताया कि यह खतरनाक घास हमीरपुर के अलावा कानपुर, घाटमपुर, जालौन और आसपास के जनपदों में खरपतवार की तेरह हर जगह लहरा रही है जिसके कण हवा में उड़कर लोगों को श्वास सम्बन्धी बीमारी को जन्म दे रहे है. जिला होम्योपैथी अस्पताल में तैनात डा.अस्थाना ने बताया कि गाजर घास के कारण अस्थमा रोग तेजी से बढ़ रहा है. इस बीमारी से महफूज रहने के लिये लोगों को घर से निकलते ही मुंह में कपड़ा (रुमाल) का प्रयोग करना चाहिये. उन्होंने बताया कि होम्योपैथी इलाज से श्वास संबन्धी बीमारी कुछ ही महीने में ठीक भी हो जाती है.

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