Tuesday , 11 December 2018
आमेर किला इसलिए खास, शिला देवी का मुख इस कारण हुआ परिवर्तित

आमेर किला इसलिए खास, शिला देवी का मुख इस कारण हुआ परिवर्तित

जयपुर, 10 अक्टूबर (हि.स). आमेर जयपुर में पर्यटन के लिए बेजोड स्थान रखता है. शिला देवी मंदिर पूरे जयपुर में जनआस्था का केन्द्र है तो पर्यटन के लिहाजे से विशेष महत्व रखता है. इसकी पहचान विश्वपटल पर है. राजस्थान का आमेर किला स्थापत्य कला का ऐसा अद्भुत स्थान है जिसकी बनावट हर किसी को आकर्षित करती है. इसकी दू रसे दिखती इमारत और अंदर माता का मंदिर हर किसी को अपनी ओर बुलाता है.

आमेर की संरक्षक मानी जाने वाली देवी शिला माता हिंदू देवी काली का अवतरण मानी जाती है. यह शिला देवी मंदिर आमेर किले के परिसर में ही स्थित है. राजा मान सिंह काली माता भक्त थे. इस कारण बंगाल से यह मूर्ति यहां आई है. कहा यह भी जाता है कि शिला देवी ने राजा को स्वपन में दर्शन दिए थे. यहां सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है. वहीं यहां पर स्थापत्य कला और इसकी बनावट बेजोड है. मंदिर को लेकर भक्तों में अद्भुत आस्था है. कोई घुटनों के बल मंदिर पहुंचता है तो कोई दंडवत हाजिरी देने पहुंचता है. कोई भक्ति तो हथेली पर दीया लिए घंटों देवी के पट खुलने का इंतजार करती नजर आते हैं लेकिन इससे भी अधिक हैरत में डालने वाली बात है शिला माता के रुष्ट होने और मुंह फेरने की. आमेर के राजा मानसिंह द्वारा स्थापित शिला माता की प्रतिमा को लेकर कई किवदंतियां हैं.

एक किवदंती के अनुसार राजा मानिसंह से देवी मां ने अपनी स्थापना के साथ ही नरबलि देने की बात कही थी लेकिन आमेर में स्थापना के बाद नरबलि नहीं दी गई और उसके स्थान पर एक बकरे की बलि देने का निर्णय लिया गया ताकि देवी नाराज नहीं हों कहते हैं इस मौके पर ही देवी ने अपना चेहरा घुमा लिया था और आज तक उनकी प्रतिमा में मुंह मुड़ा हुआ नजर आता है. तब से पशु बलि के रूप में देवी मां को खुश करने का जतन किया जाता रहा और उनके भक्त भी देवी को प्रसन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. किवदंती के अनुसार मान सिंह ने देवी की इच्छा के अनुरुप ही नदी से शिला निकाली और आमरे में उसे शिला माता के रूप में स्थापित किया. इसके बाद मानसिंह को युद्ध में जेसोर के राजा पर विजयी हासिल हुई.शिला देवी जयपुर के कछवाहा वंशीय राजाओं की कुल देवी रही हैं. मंदिर शिला माता के नवरात्र की षष्ठी पर लक्खी मेला भरता है.

शिला देवी के पाश्र्व में गणेश और मीणा कुल की देवीमाता हिंगलाश् की मूर्तियां हैं. एक किव्दंत यह भी है. शिला माता की मूर्ति को राजा मानसिंह बंगाल से लेकर आए थेण् वहां केदार राजा को पराजित करने के लिए मानसिंह ने प्रतिमा से आशीर्वाद मांगा था और उस समय बदले में देवी ने राजा केदार के चंगुल से अपना आपको मुक्त कराने की बात कही थी. इस शर्त के तहत देवी ने मानसिंह को युद्ध जीतने में सहायता की और बाद में देवी की प्रतिमा को राजा केदार से मुक्त कराते हुए मानिसंह ने आमेर में स्थापित किया. जयपुर की कुलदेवी होने के कारण यहां पर दोनो नवरात्रों में मेला भरता है वहीं शारदीय नवरात्रों में विशेष भीड़ रहती है. इस स्थान को निहारने देशी-विदेशी पर्यटक भी प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में आते है.

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