Wednesday , 14 November 2018

कोलकाता के रोगी के नाम पर लिवर लेकर दूसरे राज्य के रोगी मे किया प्रतिस्थापित, अपोलो को शोकॉज

कोलकाता, 09 नवंबर (उदयपुर किरण). कोलकाता ही नहीं वरन पूरे देश में सबसे बड़े अस्पतालों की श्रेणी में शुमार अपोलो अस्पताल की कार्यशैली पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. आरोप है कि कोलकाता के इस अस्पताल में इलाजरत रोगी के नाम पर एक ब्रेन डेड बच्ची का लीवर प्रतिस्थापन के लिए लिया और उसे दूसरे राज्य में ले जाकर किसी अन्य रोगी के शरीर में प्रतिस्थापित कर दिया गया है. इस घटना के प्रकाश में आने के बाद रीजनल ऑर्गन ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (रोटा) ने अस्पताल के सीईओ को नोटिस देकर मामले में एक सप्ताह के अंदर जवाब देने को कहा है.

रोटा में राज्य स्वास्थ्य विभाग से लेकर चिकित्सा से संबंधित उच्च पदाधिकारी शामिल होते हैं. शुक्रवार को कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में इसे लेकर रोटा की बैठक हुई जिसमें अपोलो के सीईओ राणा दासगुप्ता को बुलाया गया था. उनसे इस बारे में जवाब मांगा गया लेकिन उन्होंने जो उत्तर दिया उससे रोटा के अधिकारी संतुष्ट नहीं हुए हैं और उन्हें शोकॉज कर एक सप्ताह के अंदर लिखित में जवाब देने को कहा गया है. अगर अपोलो अस्पताल के जवाब से रोटा संतुष्ट नहीं होता है तो अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है. दरअसल गत अगस्त महीने में सिलीगुड़ी की 15 साल की मासूम मल्लिका मजूमदार को एसएसकेएम अस्पताल में चिकित्सकों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया था. इसके बाद मल्लिका के मां बाप ने उसके अंगों को दान करने का निर्णय लिया. यह जानकारी मिलने के बाद अपोलो अस्पताल की ओर से मल्लिका का लिवर लेने का आवेदन किया गया. उसमें अपोलो अस्पताल में इलाजरत पश्चिम बंगाल के एक रोगी के नाम का उल्लेख किया गया था और कहा गया था कि उन्हीं के शरीर में लीवर प्रतिस्थापित किया जाएगा. जरूरत को समझते हुए कोलकाता पुलिस की ओर से ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था और मल्लिका का लीवर अपोलो अस्पताल तक सुरक्षित पहुंचा दिया गया था.

लेकिन घटना के तीन महीने के अंदर पता चला है कि जिस रोगी के नाम पर लीवर लिया गया था उसके शरीर में इसका प्रतिस्थापन नहीं हुआ बल्कि अपोलो अस्पताल ने उस लीवर को दूसरे राज्य में मौजूद अपनी शाखा में भेज दिया था जहां किसी दूसरे रोगी के शरीर में इसे प्रतिस्थापित किया गया है. नियम है कि राज्य भर में कहीं भी किसी भी तरह का अंगदान या अंग प्रतिस्थापन होने पर अंग दाता और ग्रहिता दोनों का विस्तृत ब्यौरा रोटा को देना पड़ता है. यह भी प्रावधान है कि जिस राज्य का अंग दाता है अगर उसी राज्य में किसी रोगी को उसके अंगों की जरूरत है तो पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए. अगर राज्य में कहीं उन अंगों का इस्तेमाल नहीं हो सके तभी दूसरे राज्य में भेजा जा सकता है लेकिन अपोलो अस्पताल ने इन सभी प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए ना केवल दूसरे रोगी के नाम पर लीवर लिया बल्कि उसे दूसरे राज्य में ले जाकर किसी और के शरीर में प्रतिस्थापित कर दिया है. शुक्रवार को एसएसकेएम अस्पताल में बैठक के दौरान रोटा ने स्पष्ट कर दिया है कि अस्पताल के खिलाफ जांच होगी और निश्चित तौर पर कार्रवाई की जाएगी.

हालांकि अपोलो के सीईओ राणा दासगुप्ता से जब इस बारे में संपर्क किया गया तो उन्होंने किसी तरह की अनियमितता से इंकार किया और कहा कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है. ज्ञात हो कि दो साल पहले पूरे देश में किडनी रैकेट का खुलासा हुआ था जिसमें बड़ी संख्या में इस अस्पताल के कर्मचारियों की मिलीभगत सुर्खियों में थी. अब एक बार फिर अंगदान जैसे पुण्य काम में भी इस तरह की धांधली का मामला प्रकाश में आने के बाद अपोलो अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े हो गए हैं.

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