Sunday , 28 November 2021
कृषि वैज्ञानिकों ने चने की नई प्रजातियां विकसित की

कृषि वैज्ञानिकों ने चने की नई प्रजातियां विकसित की

नई दिल्ली. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय समन्वित चना अनुसंधान परियोजना ने हाल ही में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) में आयोजित अपने 24वें वार्षिक समूह बैठक में जीनोमिक्स की सहायता से विकसित चना की दो बेहतर क़िस्मों की पहचान की है. इन किस्मों का नाम “पूसा चिकपी 10216” और “सुपर एनेगरी -1” है, जिसे क्रमशः आईसीएआर- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईएआरआई), नई दिल्ली और यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइन्सेस- रायचूर (यूएएस-रायचूर), कर्नाटक द्वारा इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी एरिड ट्रोपिक्स (आईसीआरआईएसएटी), हैदराबाद के सहयोग से जीनोमिक हस्तक्षेप के माध्यम से प्रजनित कर, जिसे आणविक प्रजनन भी कहते हैं, विकसित किया गया है.
डॉ त्रिलोचन महापात्र, महानिदेशक, आईसीएआर और सचिव, कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई), भारत सरकार ने चना के इन दो नई किस्मों की पहचान होने पर कहा कि "यह आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और आईसीआरआईएसएटी जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन के सहयोग की सफलता की कहानी है".  उन्होंने आगे कहा कि, "प्रजनन में इस तरह के जीनोमिक्स हस्तक्षेप से जलवायु परिवर्तन से प्रेरित विभिन्न प्रकार के तनावों से पार पाते हुए चना जैसे दलहनी फसलों की उत्पादकता में वांछित वृद्धि होगी. आईसीएआर ने प्रजनन की इस नई रणनीति को अपनाते हुए कई अन्य फसलों में 24 उच्च पैदावार और गुणों वाली नई किस्में विकसित की हैं.  वर्तमान समय में इसी रणनीति से चना में नई उच्च पैदावार देने वाली किस्मों के विकास पर ध्यान केंद्रित करने से देश में दलहन उत्पादन और उत्पादकता में आवश्यक बढ़ोतरी की उम्मीद है".
आईसीआरआईएसएटी, हैदराबाद के महानिदेशक डॉ पीटर कारबेरी ने कहा कि "हम चना के उन्नत किस्मों के रूप में आईसीएआर, यूएएस-आर और आईसीआरआईएसएटी के आपसी सहयोग को फलीभूत होते को देखकर बहुत उत्साहित हैं". उन्होंने आगे कहा कि, "मुझे यकीन है कि हमारे आईसीआरआईएसएटी के भागीदारों के साथ ऐसे सहयोगात्मक प्रयासों से न केवल भारत में बल्कि उप-सहारा अफ्रीका में भी छोटे किसानों को फायदा होगा".