Sunday , 24 June 2018

भुखमरी और तानाशाही को मात देकर महान फुटबॉलर बने फेरेंक पुस्कास

नई दिल्ली:हंगरी के फेरेंक पुस्कास ने सर्वकालिक महान फुटबॉलरों में शामिल होने से पहले तमाम मुश्किलें झेलीं. गरीबी और अभावों में बचपन बीता और फिर विश्व युद्ध की मार. पैसे के लिए मैच खेलने पर टीम से निलंबन और फिर कम्युनिस्ट तानाशाही के दौरान देश छोड़ स्पेन में बसना पड़ा. पर इन तमाम अड़चनों ने पुस्कास का जज्बा और विश्व फुटबॉल में कद इतना बड़ा कर दिया कि वह करीब छह दशक बाद भी अपने देश में फुटबॉल का पर्याय बने हुए हैं…
भुखमरी और तानाशाही के बीच जीवित रखा फुटबॉल का जज्बा
फेरेंक पुस्कास अप्रैल,1927 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट के निकट किस्पेत में गरीब परिवार में जन्मे. विश्व युद्ध की मार उनके देश पर पड़ी. उस वक्त उनकी उम्र 12 साल थी. मां ने भोजन के लिए सारे कपड़े तक दे डाले. टूटी-फूटी बिल्डिंगों में नंगे पांव ही पुस्कास ने फुटबॉल का जुनून कायम रखा. परिवार के लिए पैसा जुटाने के लिए उन्होंने 16 साल की उम्र फुटबॉल करियर का आगाज किया. 1954 में पश्चिम जर्मनी के हाथों फाइनल में 3-2 से मिली हार के बाद पुस्कास और उनके साथियों के लिए सब-कुछ बदल गया. उन्हें गद्दार और पैसे व मर्सिडीज कारों के लालच में बिकने के आरोप झेलने पड़े. पुस्कास उस वक्त पागल जैसे हो गए. उन्हें ऐसे देखा जाने लगा जैसे छूत की बीमारी लगी हो.

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