Tuesday , 11 December 2018
चीन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ उठी आवाज : दिव्य उत्कर्ष

चीन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ उठी आवाज : दिव्य उत्कर्ष

चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना न्यू सिल्क रोड यानी बेल्ट ऐंड रोड परियोजना को लेकर उसके ही सहयोगी देशों की ओर से असहमति की आवाज उठने लगी है. इस परियोजना से जुड़े देशों ने चीन की भूमिका पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है. इससे इस बात का अहसास होने लगा है कि बेल्ट ऐंड रोड परियोजना का रास्ता पहले जितना सुगम नहीं रह गया है और सहयोगी ही अब चीन के लिए बाधा खड़ी करहैं. इस परियोजना से जुड़े कुछ देशों ने तो खुलकर इस बात की आशंका जाहिर करनी शुरू कर दी है कि बेल्ट ऐंड रोड परियोजना का हिस्सा बनने पर वे चीनी कर्जे के नीचे बुरी तरह दब जायेंगे और तब उनके लिए चीनी फंदे से निकल पाना निकल पाना आसान नहीं होगा.

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 2013 में बेल्ट ऐंड रोड के नाम से मशहूर न्यू सिल्क रोड परियोजना की घोषणा की थी, जिसके तहत चीन अपने कई सहयोगी देशों में ढांचागत सुविधाओं का नेटवर्क तैयार करने में मदद कर रहा है. इसके तहत रेलवे, रोड और बंदरगाहों का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है. इन कार्यों के संपादन के लिए चीन ने अपने सहयोगी देशों को अरबों डॉलर का कर्ज देने का प्रस्ताव किया है. परियोजना का काम कई देशों में शुरू भी हो चुका है. लेकिन अब चीन के कई सहयोगी देशों को लगने लगा है कि चीन उनकी मदद करने का दिखावा करते हुए अपनी विस्तारवादी योजना को अंजाम दे रहा है. चीन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह अपने सहयोगी देशों को कर्ज के जाल में फंसा रहा है, जिससे कि आगे चलकर उन पर वह दबाव बना सके.

चीन का इतिहास कुछ इसी तरह का रहा है. हाल के दिनों में ही उसने श्रीलंका और मालदीव में अपने कर्ज का फंदा अपनी विस्तारवादी नीति के अनुरूप कसा है. इस कारण श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह को औपचारिक तौर पर चीन को 99 साल के पट्टे पर देना पड़ा है. श्रीलंका के इस महत्वपूर्ण बंदरगाह पर चीन का आधिपत्य कायम हो गया है. इसी तरह मालदीव में भी चीन की नीयत जमीन कब्जाने और उपनिवेशवादी नीतियों का विस्तार करने की ही है. मालदीव के निर्वासित नेता मोहम्मद रशीद के मुताबिक मालदीव के विदेशी कर्ज में 80 फ़ीसदी हिस्सेदारी चीन के कर्ज की ही है. यही कारण है कि पिछले साल ही मालदीव को 1.4 अरब डॉलर कि एक परियोजना के लिए लिए गए कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने के कारण अपने एक रणनीतिक बंदरगाह को 99 साल की लीज पर चीन को देना पड़ा.

इस तरह से देखा जाये तो चीन ने श्रीलंका और मालदीव दोनों को ही अपने कर्ज के जाल में फंसाकर उनके एक-एक बंदरगाह को अपने कब्जे में कर लिया है. चीन के सहयोगी देशों को इसी बात का डर सताने लगा है कि कहीं आगे चलकर बेल्ट ऐंड रोड परियोजना के नाम पर चीन उन्हें जो आर्थिक मदद कर रहा है, उसके एवज में वह उनके बंदरगाहों या महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा न करने लगे. कहा जा रहा है कि चीन के जो सहयोगी देश इस परियोजना के तहत ढांचागत सुविधा खड़ी करने के लिए उससे भारी-भरकम राशि कर्ज के रूप में ले रहे हैं, वे अगर समय से कर्ज चुकाने में सफल नहीं हुए, तो वे चीनी कर्ज के फंदे में फंस जायेंगे और उन्हें भी श्रीलंका और मालदीव की तरह ही मजबूरन अपनी जमीनों का पट्टा चीन के हवाले करना पड़ेगा.

ऐसे भी चीन की बेल्ट ऐंड रोड परियोजना का मूल उद्देश्य चीनी उत्पादों का सुगम परिवहन करना ही है, ताकि चीन में बने सामानों को विदेशी बाजार में आसानी से खपाया जा सके. यानी इस परियोजना से होने वाला आर्थिक लाभ सीधे-सीधे चीन को मिलेगा, लेकिन अगर इस परियोजना में शामिल देश उसका कर्ज वापस नहीं लौटा सके, तो नुकसान चीन का न होकर उस देश का होगा, जहां चीन ने बुनियादी ढांचा खड़ा किया है. इस तरह चीन के दोनों हाथ में लड्डू है. एक तो वह इस परियोजना के जरिए अपने उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से खपाने की तैयारी कर रहा है, वहीं अपने सहयोगी देशों को डेब्ट ट्रैप में भी फंसा रहा है.

यद्यपि चीन का कहना है कि बेल्ट ऐंड रोड परियोजना एक ओपन प्रोजेक्ट है और इस परियोजना में शामिल देशों के साथ चीन का व्यापार 500 अरब डॉलर तक बढ़ गया है. इसमें चीन का प्रत्यक्ष निवेश भी 67 अरब डॉलर से अधिक हो गया है. लेकिन इसमें जो बात उसके सहयोगी देशों को डरा रही है, वह यह कि ये पूरा प्रोजेक्ट चीनी विशेषज्ञों और तकनीशियनों द्वारा ही संचालित किया जा रहा है. इस परियोजना में स्थानीय स्तर पर सिर्फ मजदूरों का ही उपयोग हो रहा है. कहने का मतलब ये कि जब इन पर परियोजनाओं का संचालन पूरे जोर-शोर से होने लगेगा, तब भी इनके संचालन के लिए उन देशों को चीन पर ही निर्भर करना पड़ेगा. इस तरह एक बार जब ये परियोजनाएं चलने लगेंगी तो सहयोगी देश पूरी तरह से चीन के चंगुल में फंस जायेंगे.

यही वजह है कि पिछले ही महीने मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने घोषणा की थी कि उनका देश चीन की मदद से चलने वाली अपनी तीन परियोजनाओं को बंद कर रहा है. इन परियोजनाओं में 20 अरब डॉलर लागत वाली रेलवे की एक परियोजना भी शामिल है. इसी तरह पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी बेल्ट ऐंड रोड परियोजना में और पारदर्शिता लाने की बात कही है. साथ ही उन्होंने शपथ लेने के बाद अपने शुरुआती भाषण में ही चीन के कर्ज को लेकर भी चिंता जतायी है. इमरान खान का कहना है कि चीन से मिले अरबों डॉलर के कर्ज को चुकाने में उनका देश सक्षम हो पायेगा या नहीं, इसकी समीक्षा करने के बाद ही बेल्ट ऐंड रोड परियोजना पर आगे बढ़ने के संबंध में कोई निर्णय लिया जायेगा.

इसमें कोई शक नहीं है कि चीन की पहचान हमेशा ही एक संदिग्ध देश की रही है. ताइवान से लेकर तिब्बत तक चीन ने अपनी विस्तारवादी नीतियों का ही परिचय दिया है. इसके साथ ही हाल में ही जिस तरह से उसने श्रीलंका और मालदीव के बंदरगाहों पर कब्जा किया है, उसने उसे और भी संदिग्ध बन बना दिया है. इसके साथ ही एक बड़ी बात ये भी है कि हाल के दिनों में चीन की मुद्रा युआन लगातार कमजोर हुई है. ऐसे में इन परियोजनाओं को लेकर सहयोगी देशों का रवैया और भी सतर्क होने वाला बन गया है. इस परियोजना के लिए चीन अपने सहयोगी देशों को जो कर्ज दे रहा है, उसमें एक बड़ी राशि अपने तकनीशियनों के वेतन के रूप में खर्च कर रहा है. सहयोगी देशों पर यह कर्ज डॉलर के रूप में लादा जा रहा है, जबकि वह अपने तकनीशियनों और विशेषज्ञों को भुगतान अपनी मुद्रा में कर रहा है. स्वाभाविक रूप से चीनी मुद्रा के कमजोर होने की वजह से चीन को इस मद में कम मुद्रा उसे खर्च करनी पड़ रही है, जबकि कर्ज की वापसी वो डॉलर के रूप में लेकर यहां भी पैसे बचाने वाला है.

जिन देशों ने चीन के बेल्ट ऐंड रोड परियोजना पर गंभीर चिंता जताई है, उनमें कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मालदीव, मोंटेनेग्रो, पाकिस्तान जिबूती, लाओस और मंगोलिया शामिल हैं. सहयोगी देशों द्वारा आशंका जताये जाने के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने इस बात की आशंका को हालांकि पूरी तरह से खारिज किया है कि वह अपने सहयोगी देशों को कर्ज के जाल में फंसा रहा है. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि चीन का पुराना रवैया दागदार रहा है और जिस तरह से वह भारी-भरकम कर्ज अपने सहयोगी देशों को अपनी परियोजना के नाम पर दे रहा है, उससे कहीं न कहीं उसकी कुत्सित मंशा का आभास मिलने लगा है.

(लेखक आईसीएफएआई यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं)

Report By Udaipur Kiran

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