Thursday , 18 October 2018

रोडवेज हड़ताल : तीसरे दिन भी नहीं चलीं रोडवेज की 4700 बसें

अजमेर, 19 सितम्बर (उदयपुर किरण). राजस्थान की यातायात घड़कन थम गई है. राजस्थान स्टेट रोडवेज की करीब 4 हजार 700 बसों का लगातार तीसरे दिन भी चक्का जाम है. प्रदेश को रोडवेज से होने वाली प्रतिदिन 6 करोड़ रुपए की राजस्व आय के हिसाब से अब तक 18 करोड़ रुपए का सीधा फट्टा लग चुका है. रोडवेज के 17 हजार सेवारत और 9 हजार सेवानिवृत्त कर्मचारी राज्य सरकार की रोडवेज व कर्मचारी विरोधी नितियों के खिलाफ ठाले बैठे धरना प्रदर्शन करने पर उतारू हैं. परोक्ष और अपरोक्ष रूप से प्रदेश के लगभग एक करोड़ लोग रोडवेज की हड़ताल से प्रभावित हैं. इनमें रोडवेज कर्मचारियों के अतिरिक्त वे तमाम दिहाड़ी कामगार लोग भी शामिल हैं जो प्रदेश के 50 से अधिक रोडवेज डिपो के अन्दर और बाहर यात्री सेवाओं से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. राज्य सरकार और उनके प्रशासनिक कारिंदे आंखों पर पट्टी और कानों में रुई डाले प्रदेश की जनता को बेजा परेशान होते देख रहे हैं. स्वयं मुख्यमंत्री प्रदेश में सबका साथ सबका विकास का नारा लिए गौरव यात्रा कर रही हैं.

राजस्थान रोडवेज संयुक्त मोर्चा में शामिल एटक, सीटू, इंटक, रिटायर कर्मचारी एसोसिएशन, भारतीय मजदूर संघ के नए घटक डीजेजेएन, रोडवेज कर्मचारी कल्याण समिति राजस्थान में रोडवेज के चक्का जाम में शामिल है. रोडवेज के संयुक्त मोर्चा का आरोप है कि सरकार ने उनके साथ वादा खिलाफी की है. अब सरकार चुनाव आचार संहिता लगने का इंतजार कर उनकी जायज मांगों पर कान नहीं धरना चाह रही है. इसलिए उनसे वार्ता करने को तैयार नहीं है ना ही उनकी मांगों पर किसी तरह का कोई एक्शन ले रही है. दरअसल राजस्थान सरकार ने रोडवेज कर्मचारियों की विगत 25 से 27 जुलाई को हुई हड़ताल के बाद की समझौता वार्ता में कर्मचारियों की अधिकांश मांगों पर सकारात्मक रुख दर्शाते हुए उन्हें हड़ताल समाप्त करने पर राजी कर लिया था. किन्तु समय बीतने के बाद भी सरकार ने उनकी मांगों पर ठोस कार्यवाही नहीं की.

राजस्थान रोडवेज एम्पलाईज यूनियन एटक के डिवीजन सचिव बनवारी लाल की माने तो रोडवेज कर्मचारियों की प्रमुख मांगों में 7 वें वेतनमान को लागू करने, रोडवेज के बेड़े में नई गाड़ियों को लगाने,रोडवेज में चालक व परिचालकों की भर्ती करने, 15 जुलाई से 18 सितम्बर 2018 तक सेवानिवृत्त लगभग 600 कर्मचारियों के बकाया ग्रेच्युटी, नाइट ओवर टाईम, छठे वेतन आयोग का बकाया, छुट्टी व मेडिकल बिल आदि परिलाभ के करीब 400 करोड़ रुपए का भुगतान करने, रोडवेज को निजीकरण की ओर धकलने की नीति को बंद करने, रोडवेज की खटारा हो रही करीब 50 प्रतिशत गाड़ियों की मरम्मत व रखरखाव के लिए बजट व सामग्री उपलब्ध कराने आदि मांगे प्रमुख हैं. राज्य सरकार ने रोडवेज के संयुक्त मोर्चा के साथ 27 जुलाई को किए लिखित समझौते के अनुसार 7 वें वेतनआयोग को लागू करने के लिए समिति का गठन कर उनकी सिफारिशों के अनुसार कार्यवाही करने, रोडवेज के सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया में से करीब 150 करोड़ रुपए का बजट अविलम्ब जारी करने जिसमें 100 करोड़ रुपया सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया भुगतान का तथा 50 करोड़ रुपया वर्तमान में सेवारत कर्मचारियों के डीए व बोनस आदि के भुगतान का शामिल था, सहित अन्य मांगों पर सहमति प्रदान की थी. किन्तु सरकार ने वादा खिलाफी की.

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लिए कमेटी का गठन ही विलम्ब से किया. नतीजा यह रहा कि कमेटी ने रिपोर्ट भी विलम्ब से दी अब जब रिपोर्ट दी जा चुकी है तो उसपर चर्चा के लिए पहले 5 सितम्बर की तारीख दी थी फिर 11 सितम्बर इसे भी बड़ा कर 18 सितम्बर को वार्ता होनी थी किन्तु अब यह भी 25 सितम्बर तक टाली जा रही है. इसके अलावा राज्य सरकार ने अपने वादे के विरुद्ध सिर्फ 48 करोड़ 83 लाख रुपए का बजट रोडवेज के सेवानिवृत्त कर्मचारियों का बकाया भुगतान करने के लिए जारी किया. इससे सिर्फ 15 जुलाई तक के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को राहत मिल सकी. जबकि वर्तमान कर्मचारी और 15 जुलाई के बाद सेवानिवृत्त हुए कर्मचारी जिनमें प्रत्येक का करीब 20—20 लाख रुपया सरकार पर बकाया है अपने ही मेहनत की धनराशि पाने के लिए सड़कों पर प्रदर्शन करने को मजबूर हो रहे हैं.

राजस्थान रोडवेज संयुक्त मोर्चा का आरोप है कि सरकार जानबूझ कर उनकी मांगों पर विचार करने से कतरा रही है. सरकार येनकेन प्रकारेण समय जाया कर चुनाव आचारसंहिता लगने का इंतजार कर रही है जिससे सरकार को राहत मिल जाए. किन्तु कर्मचारियों ने भी इस बार सरकार से आरपार की लड़ाई का मानस बना लिया है. यही वजह है कि रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल को जनता का भी समर्थन मिल रहा है.

सरकार की नीति और नीयत में है खोट—
रोडवेज कर्मचारी संयुक्त मोर्चा का आरोप है कि राज्य सरकार ने उच्च स्तर पर रोडवेज के निजी करण का मानस बना रखा है. रोडवेज में दिखावटी 600 करोड़ रुपए का घाटा दर्शाते हुए बड़े ठेकेदारों को अनुबंध पर बसे लगाने के लिए राजस्थान में बुला लिया है. प्रदेश में वर्तमान में करीब 12 सौ अनुबंधित बसें संचालित हैं जिन्हें राज्य सरकार प्रति किलोमीटर 20 रुपए की दर से भुगतान कर रही है और डीजल भी दे रही है. इससे जहां रोडवेज के करीब 1200 चालकों और परिचालकों को बेरोजगार होकर तबादलों के धक्के खाने पड़ रहे है वहीं नई भर्तियों पर भी अघोषित रोक लग गई हैं. यह सीधेतौर पर रोडवेज पर भार है.

विगत 5 साल में नई गाड़ियों की नहीं हुई खरीद—
रोडवेज के आन्दोलनरत कर्मचारियों का आरोप है कि एक तरफ तो राज्य सरकार ने रोडवेज बसों के रखरखाव के लिए जरूरी टायर व अन्य सामग्री की सप्लाई पर पूरी तरह रोक लगा रखी है जिससे 50 प्रतिशत रोडवेज बसें खराब हालत में पहुंच कर कंडम होने की ओर हैं, दूसरी तरफ रोडवेज बेड़े में 5 साल में एक भी नई बस शामिल नहीं की गई है. इससे साफ जाहिर है कि सरकार रोडवेज को निजीकरण की ओर धकेल रही है.

शीघ्र निर्णय नहीं हुआ तो जनता होगी परेशान—
रोडवेज के चक्का जाम से हजारों दिहाड़ी कामगारों की रोजी रोटी पर सीध असर पड़ रहा है. रिक्शा चालक, कुली, अखबार और पानी की बोतल, मूंगफली व नमकीन बेचने वाले, चाट—पकोड़ी का ठेला रेहड़ी लगाने वाले, चाय पान की थड़ी वाले, जूते पॉलिश करने वाले, जैसे हजारों मजदूरों की रोजीरोटी बुरी तरह प्रभावित हो रही है. दैनिक यात्री मजबूरन अधिक किराया भर कर अन्य साधनों से नौकरी व गंतव्य पर जाने को विवश हैं.

राजस्थान में विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर—
रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल का सीधा असर राज्य सरकार को आने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है. प्रदेश में इन दिनों मेले उत्सव के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के दौर चल रहे है. इन हालातों में बरोजगारों व महिला और बुजुर्गों तक को रोडवेज बसों के चक्का जाम होने से खासी परेशानी हो रही है. लोग सरकार की नीतियों से खफा होकर सरकार के खिलाफ मतदान के जरिए अपना रोष जाहिर करने का मानस बनाने लगे हैं.

Source : http://udaipurkiran.in/hindi/

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