Tuesday , 11 December 2018
किस किस का करेंगे मुंह बंद : डॉ. कविता सारस्वत

किस किस का करेंगे मुंह बंद : डॉ. कविता सारस्वत

केरल की एक नन के साथ बलात्कार के मामले में आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल की गिरफ्तारी हो चुकी है और 22 सितंबर को उसकी जमानत अर्जी खारिज कर उसे रिमांड पर भी भेजा जा चुका है. इसके बावजूद इस घटना को लेकर जिस तरह एक वर्ग ने पीड़ित नन को बदनाम करने का अभियान चलाया और आपत्तिजनक टिप्पणी की, उस पर विचार किया जाना चाहिए.

केरल के एक विधायक पीसी जॉर्ज ने पीड़ित नन को वेश्या तक की संज्ञा दे दी. उनका कहना था वह नन निहित स्वार्थ की वजह से बिशप पर आरोप लगा रही है. उनका ये भी कहना था कि जब उसके साथ कई बार बलात्कार पहले ही हो चुका था, तो उसने तभी क्यों नहीं पुलिस के पास अपनी शिकायत दर्ज करायी. उनके इस बयान से नाराज पीड़ित नन और उसकी सहयोगियों ने जब उनकी आपत्तिजनक टिप्पणी के खिलाफ प्रदर्शन किया तो प्रतिक्रिया में पीसी जॉर्ज ने और भी कई आपत्तिजनक बातें कहीं. इसी के जवाब में केरल में ‘शट योर माउथ कैंपेन’ चलाया गया और इसका परिणाम भी तुरंत नजर आया. देखते ही देखते केरल में की महिलाओं ने इसमें सहभागिता की. महिलाओं के अलावा समाज के कई अन्य वर्ग के पुरुषों ने भी इस कैंपेन का समर्थन किया.

शट योर माउथ कैंपेन की शुरुआत कलाकार और पर्यावरण विद आयशा महमूद ने अपने फेसबुक वॉल के जरिए की थी, जिसने देखते ही देखते सोशल मीडिया के चर्चित कैंपेन का रूप ले लिया. इस क्रम में हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले लोगों में पीसी जॉर्ज ही कोई अकेले शख्स नहीं हैं. इसके पहले भी राजनीति व अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई चर्चित लोग भी महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते रहे हैं. राजनीतिक वजहों से भी कई बार लोग अपने विरोधी पक्ष की महिलाओं को लेकर आपत्तिजनक व अशालीन टिप्पणियां करते रहे हैं.

राजनीतिज्ञों के अलावा अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोग भी महिलाओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करते रहे हैं. बॉलीवुड के मशहूर सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य का ही उदाहरण लिया जा सकता है. उन्होंने अपने ट्विटर एकाउंट पर अरुंधती राय, स्वाती चतुर्वेदी और शेहला रशीद जैसी प्रतिष्ठित महिलाओं के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. ये तीनों ही महिलाएं आज की तारीख में पहचान की मोहताज नहीं हैं. वैचारिक तौर पर अभिजीत की सोच इनकी सोच से मेल नहीं खाती है. बल्कि ये कहना ज्यादा ठीक होगा कि इन महिलाओं और अभिजीत की सोच सर्वथा विपरीत है. संभवतः इसी वजह से अभिजीत ने सोशल मीडिया पर अमर्यादित टिप्पणी कर उनका चारित्रिक हनन करने की कोशिश की. हालांकि इसकी काफी तीव्र प्रतिक्रिया हुई और शिकायत होने के बाद उनका टि्वटर एकाउंट भी कुछ समय के लिए सस्पेंड कर दिया गया. हैरानी की बात तो यह है कि अभिजीत आगे भी यही कहते रहे कि उन्हें अपना ट्विटर एकाउंट सस्पेंड होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि देश की अधिकांश जनता उनके साथ है.

अगर थोड़ा पीछे के समय में जायें, तो 2013 में तृणमूल कांग्रेस के नेता स्वप्न देबनाथ ने एक रैली के दौरान अपनी विरोधी पार्टी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की महिला नेताओं को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि इस पार्टी की महिला नेताओं का चरित्र इतनी गिरा हुआ है कि ये लोग अपन कपड़े खुद फाड़ लेती हैं, ताकि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया जा सके. भरी रैली में इस तरह की टिप्पणी के बाद लोगों ने तालियां भी खूब बजायी थी. राजनीतिक वजहों से टीएमसी समर्थकों को स्वप्न देबनाथ की बात में कुछ भी गलत नहीं लगा. वे इस बात का अनुमान ही नहीं लगा सके कि कैसे उनके नेता ने महिलाओ को अपमानित करने की कोशिश की है. दुखद बात तो यह है कि स्वप्न देबनाथ जिस पार्टी से जुड़े हुए हैं, उस पार्टी की मुखिया खुद एक महिला हैं.

इसी पार्टी के एक और नेता तापस पाल ने तो खुलेआम विरोधी दल की महिला नेताओं को धमकी दी थी कि अगर वे राज्य की ममता बनर्जी सरकार का विरोध करेंगी, तो उन लोगों का रेप करवा दिया जाएगा. ऐसे अमर्यादित बयान देने के बाद भी उनके खिलाफ न तो प्रशासन ने कोई कार्रवाई की और न ही उनकी पार्टी ने. ऐसे में सवाल उठता है कि ये हमारी कैसी मानसिकता होती जा रही है. ऐसे अशालीन बयान देने वाले लोग हमारे जनप्रतिनिधि कैसे हो सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ क्षेत्रीय पार्टियों के नेता ही इस तरह की उटपटांग टिप्पणियां करते हैं. कुछ समय पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी महिलाओं को लेकर अटपटी टिप्पणी की थी. राहुल गांधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोधी हैं, इसमें कोई शक नहीं है. वे प्रायः संघ की आलोचना करते रहते हैं. इससे किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है. लेकिन एक बार संघ की आलोचना करने के क्रम में उन्होंने कह डाला कि वे संघ में ‘शॉर्ट्स’ पहनी महिलाओं को देखना चाहते हैं लेकिन अभी तक शाखा में किसी भी महिला को निक्कर पहने नहीं देखा है. सवाल ये है कि वे संघ की शाखा में निक्कर पहनी महिलाओं को क्यों देखना चाहते हैं. हो सकता है कि राहुल गांधी अपनी इस टिप्पणी से संघ को महिला विरोधी साबित करने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन उनकी टिप्पणी का निशाना तो आखिर महिलाएं ही बनी.

सवाल ये भी है कि ऐसे लब्ध प्रतिष्ठित लोगों को महिलाओं पर उटपटांग टिप्पणी करने में आनंद क्यों आता है. महिलाओं को निशाना बनाकर ये लोग क्या साबित करना चाहते हैं. किसी के साथ वैचारिक विरोध होना सामान्य बात है. राजनीतिक प्रतिबद्धता की वजह से कई बार वैचारिक विरोध होता है. लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि महिलाओं के प्रति अश्लील या मर्यादाहीन टिप्पणी की जाय. भारतीय कानून में भी महिलाओं पर की जाने वाली आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर सख्त कार्रवाई करने के लिए व्यवस्था की गयी है. इसके बावजूद लोग अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाते हैं. इसलिए अगर आज केरल में नन रेप के मामले में को लेकर विधायक पीसी जॉर्ज के खिलाफ ‘शट योर माउथ कैंपेन’ चलाया जा रहा है, तो इसका न केवल समर्थन करना चाहिए, बल्कि महिलाओं के प्रति की जाने वाली अशालीन टिप्पणी का हर स्तर पर विरोध करना चाहिए. जिससे कि प्रतिष्ठित होने का गुमान भरने वाले माननीय लोगों को भी अहसास हो सके कि अशालीन, अश्लील या अमर्यादित टिप्पणी करने पर उन्हें भी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है.

Source : http://udaipurkiran.in/hindi/

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