Friday , 16 November 2018

मुगलकालीन मंदिर में उमड़ती है चाटी चलाने वाले साधकों की भीड़

बेगूसराय, 14 अक्टूबर (उदयपुर किरण). विज्ञान बहुत तरक्की कर चुका है. नई पीढ़ी तंत्र-मंत्र से दूर भागकर इसे अंधविश्वास कह रहे हैं. लेकिन नवरात्रा के अवसर पर आज भी तंत्र-मंत्र की सिद्धि कामियों की कमी नहीं है. यह नजारा पूर्वोत्तर भारत में कामाख्या के बाद तंत्र सिद्धि के सबसे बड़े केंद्र बिहार के बखरी में आज भी दिखता है. साबर तंत्र के विख्यात साधिका बहुरा मामा के मरने के सैकड़ों वर्ष बाद भी उनकी धरती बखरी में इस नवरात्र में भी दो सौ से अधिक लोग माता दुर्गा के समक्ष तंत्र सिद्धि में लग चाटी चलाने की साधना में लगे हैं.

मुगल काल से ही अटूट आस्था और भक्ति का केंद्र रहे बेगूसराय जिला के बखरी स्थित प्राचीन दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र के शुरू होते ही तंत्र साधक जुटकर अपनी तंत्र साधना शुरू कर देते हैं. महाअष्टमी की शाम बिहार, बंगाल, असम, झारखंड के अलावा नेपाल के दूरदराज से बड़ी संख्या में तंत्र साधना के लिए साधक यहां पहुंचकर तंत्र विद्या की सिद्धि प्राप्त करते हैं. इस दिन शाम ढ़लते ही ढोलकों के थाप के बीच साधक विभिन्न मुद्राओं में लीन हो जाते हैं, जिसमें एक प्रमुख क्रिया को चाटी चलाना कहा जाता है. इस प्रक्रिया में जो साधक माता की ओर बढ़े चले जाते हैं. उनकी साधना सिद्ध मानी जाती है.

यह प्रक्रिया संध्या वेला से मध्यरात्रि माता का पट खुलने तक जारी रहता है. कहा जाता है कि भगवती जागरण (जगरना) की रात्रि जिसकी चाटी चल गई, उसे सिद्धि मिल गई. इससे जुड़े लोग बताते हैं कि चाटी चलने के बाद माता से आशीर्वाद लेकर घर लौटने वाला भगत जिस भी पौराणिक मान्यता के दैवीय आपदा, सर्प दंश, बिच्छू दंश, भूत, प्रेत, डायन आदि के शिकार मनुष्य या किसी भी जीव को ठीक कर देते हैं. कहा जाता है कि तंत्र विद्या की शुरुआत यहां चौदहवीं शताब्दी से आरंभ हुआ था. किंवदंती के अनुसार 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में सल्तनत कालीन सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था में बिखराव को रोकने के लिए महिला नेतृत्व का उभार हुआ था, जिसका नेतृत्व तत्कालीन उतरांग प्रदेश की बहुरा गोढ़िन ने किया था. बहुरा मामा के नाम से प्रसिद्ध बहुरा गोढ़िन ने अपनी तांत्रिक विद्या के माध्यम से महिलाओं को गोलबंद किया, जिसकी शुरुआत देवी दुर्गा की आराधना से हुई तथा यह परंपरा आज भी कायम है. नगर के पूरब स्थित सार्वजनिक दुर्गा स्थान परिसर में बहुरा गोढ़िन का मंदिर विद्यमान है.

पुरानी दुर्गा स्थान में चाटी चलने बाद भगत (भक्त) श्रद्धा भाव से तंत्र साधना पूरा होने पर उसके सिद्ध भाव की कामना बहुरा मामा से करते हैं. पुरानी दुर्गा मंदिर के पुजारी अमरजीत ठाकुर, अध्यक्ष रत्नेश्वर प्रसाद सिंह, सचिव तारानंद सिंह एवं सदस्य सुमनजीत सिंह सुमन बताते हैं कि मंदिर की स्थापना समय से ही सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में विख्यात रहने के कारण यहां तंत्र साधकों का जमावड़ा लगता है. कुछ साधक जहां अपने गुरु को साथ लेकर आते हैं. वहीं, स्थानीय निशाहरा के गुरुओं की देखरेख में भी मां भगवती के समक्ष अपनी तंत्र साधना सिद्ध करते हैं.

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