Friday , 16 November 2018

रियासतकाल से दशहरा के पूजा-विधानों में बजता रहा है मुंडा बाजा

जगदलपुर, 14 अक्टूबर (उदयपुर किरण). सैकड़ों वर्षों से बस्तर दशहरा के समय विशेष रूप से देवी आराधना करते हुए जिस बाजे की आवाज लोगों को सुनायी पड़ती है, वह मुंडा बाजा बस्तर के दशहरे की विशेष प्रस्तुति है और यह लोगों के आकर्षण का केन्द्र होता है. बस्तर दशहरे में कुछ परम्परागत पोशाकों में एक विशेष प्रकार का वाद्य यंत्र बजाते हुए लोगों को आज भी देखा जा सकता है. यह मुंडा बाजा के रूप में प्रचलित है और उसको बजाने वाले समीपवर्ती ग्राम पोटानार के ग्रामीण होते हैं.

मिली जानकारी के अनुसार यह मुंडा बाजा बस्तर के जंगलों से प्राप्त सिवना लकड़ी से गहरा कर बनाये गये खोल में बकरे के चमड़े को मढक़र बनाया जाता है. पिछले चार सौ वर्षों से इस बाजा की गूंज दशहरे के समय सुनायी पड़ती है. इस समय बस्तर दशहरे में दो टोलियों में बटे हुए मुुुंडा बाजा के समूह हैं जो दशहरा रथ परिचालन के समय देवी आराधना करते हुए अपने बाजे से लोगों का मन मोह लेते हैं. पोटानार के इन वादक कलाकारों ने बताया कि राजाओं के जमाने में विशेष पूजा-अर्चना करने के लिए उन्हें यह वाद्य यंत्र बजाने के लिए बुलावा मिलता था और वे पूजा -आरती के समय इस वाद्य यंत्र को बजाते थे.

उन्होंने बताया कि पहले इस मुंडा बाजा का स्वरूप दूसरा था लेकिन समय के साथ-साथ इसमें परिवर्तन होता गया और आज यह वर्तमान रूप में दिखाई देता है. इस बाजे को बनाने के लिए विशेष उपाय किये जाते हैं. जिससे इसकी ध्वनि बजाने पर कर्ण प्रिय निकलती है. वर्तमान में अभी वे वर्ष में दो बार ही इस वाद्य यंत्र मुंडा बाजा का वादन करते है और यह समय होता है. वर्ष में एक बार यहां दशहरा के अवसर पर तथा दूसरा अवसर होता है मां दंतेश्वरी के शक्तिपीठ दंतेवाड़ा में आयोजित होने वाले वार्षिक फाल्गुन मेले के समय में किया जाता है.

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