Wednesday , 14 November 2018

अजमेर की चार सीटों पर नए चेहरों की तलाश

अजमेर, 15 अक्टूबर (उदयपुर किरण). विधानसभा चुनाव- 2018 को लेकर अजमेर सहित समूचे प्रदेश में सत्तारूढ़ दल की हवा खराब है. विकास के वादे और प्रति दावों के बीच जमीनी सच्चाई है कि भाजपा और कांग्रेस फिर से अपनी खोई सभी सीटें पाने के लिए सामाजिक चेहरे वाले सियासी सोच के उम्मीदवारों की तलाश में हैं. जातिय समीकरण को साधने और मतदाताओं के ध्रुवीकरण को बांधने वाले उम्मीदवार की खोज पूरी होने पर कौन सा राजनीतिक दल सूची जारी करने की पहल करेगा मतदाताओं की नजर यहीं पर टिकी है.

फिलवक्त अजमेर जिले के आठों विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशी चयन के लिए आलाकमान द्वारा भाजपा शहर व देहात के पदाधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों को रायशुमारी के लिए 21 अक्टूबर को जयपुर बुलाया गया है. चुनाव पूर्व अखबारों में सुर्खियां पा रहे विविध राजनीतिक सर्वों में यद्यपि कोई दम नहीं है, इनसे प्रदेश में सरकार आने और जाने को लेकर चौपालों की चर्चाएं भले गर्म होने लगी हों हकीकत है कि आम मतदाता का भला कौन कर सका आत्मविश्वास के साथ यह बताने को कोई तैयार नहीं है.

मतदाताओं के लिए दोनों ही पार्टियां समान

कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों को मतदाता एकसा ही मानता हैं फिर भी विज्ञापनों के भरोसे कंपनी की तरह चल रही सरकार बदले, मतदाता मन बना बैठा है. नौकरी पेशा वर्ग सरकार की मुफ्तखोरी और महंगाई को झीक रहा है तो व्यापारी वर्ग बाजार में मंदी और नोटबंदी पर बेजार है. दिहाड़ी खाने कमाने वाला तो आजादी के बाद से आज तक घी चुपड़ी रोटी खाने लायक कभी उन्नत बना ही नहीं, तो आगे क्या होगा? इस सरकार में तो उसकी रोजी-रोटी को ही लाले पड़ गए. कभी बजरी पर रोक तो कभी जीएसटी, कभी नोटबंदी तो कभी, रोडवेज बंदी या भारतबंदी. इसलिए वो तो सरकार के चुने जाने की चर्चा को ही तैयार नहीं.

भाजपा व कांग्रेस वोटबैंक साधने में लगे

जुबान से कहने को विकास के दावे हैं, हकीकत में सियासी पार्टियों की नजरें तो सिर्फ वोट बैंकों वाले जातिय समीकरणों को साधने पर गढ़ी हैं. जाटों को एडजस्ट करना है. राजपूत को कहां से चुनाव में उतारा जाए? रावत समुदाय को इस बार कितने टिकट मिलें? ब्राह्मण को रिप्लेस करें तो कौन हो, वैश्य में से किसे आगे बढ़ाएं जैन अल्पसंख्यकों में आ गए, माहेश्वरी, खण्डेलवाल, अग्रवालों में एका नहीं हो पाता. एससी और एसटी सीटें भले आरक्षित हांे पर इनमें भी छोटी बड़ी 36 कौमों कीे बड़ी फांस है. ओबीसी पर हर कोई अपना हक तो जता जाता है पर चुनाव में सीट जीत कर तीसरा मोर्चा ले जाता है. गुर्जरों पर भरोसा कौन करे? इस बार गुर्जर भाजपा के साथ होने वाले हैं क्या? कांग्रेस के सचिन पायलट मुख्यमंत्री बन रहे हों तो गुर्जर कांग्रेस के नहीं तो देखेंगे कि कौन गुर्जरों का साथ देगा, उसे ही चुनेंगे. माली, सिंधी, मुस्लिम, महिला, युवा, और ना जाने कौन-कौन से जोड़-घटा समीकरण सोचे -विचारे जा रहे हैं.

भाजपा में जातियों से छेड़छाड़ संभव नहीं

अजमेर जिले की 8 विधान सभा सीटों पर फोकस करें तो वर्तमान में 7 भाजपा के पास और 1 कांग्रेस के पास है. जो सीट कांग्रेस के पास है वह उपचुनाव में कांग्रेस ने फिर से कब्जाई हुई है. अन्यथा आठों सीटंे वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा के पास थीं. मौजूदा अवस्था में जिले की पुष्कर और व्यावर सीट से रावत समाज, मसूदा सीट से राजपूत, केकड़ी सीट से ब्राह्मण, किशनगढ़ व नसीराबाद सीट से जाट समाज को प्रतिनिधित्व मिला है. अजमेर दक्षिण की सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है तो अजमेर उत्तर की सीट जनता के ना चाहते हुए भी सिंधी समुदाय के लिए आरक्षित बना दी गई हैं. ऐसे में वैश्य वर्ग उपेक्षित रहा. गुर्जर समाज नाराज रहा. मुस्लिम वर्ग भाजपा से बेबात-यूं ही छिटका रहा.

महिलाओं से पुरुष मतदाता 31 हजार ज्यादा

इस बार चुनाव में समूचे जिले के 18 लाख 50 हजार मतदाताओं को मताधिकार का प्रयोग करना है. इनमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 9 लाख 41 हजार के आसपास है जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 9 लाख 9 हजार. अमूमन प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में औसत 2 लाख 50 हजार के आस पास मतदाता हैं. इनमें जिस जात बिरादरी का जोर जिस विधानसभा सीट पर ज्यादा है वहां से वह बढ़त में रहता आया है और टिकट भी उसी जात बिरादरी को मिलता रहा है. यह बात ओर है कि इस बार टिकट वितरण में जात बिरादरी के अलावा सामाजिक चेहरा व सियासी सोच को भी देखा जा रहा है. शहरी, युवा, महिला, संत, नौकरीपेशा को भी मौका दिया जा सकता है. जो भी होगा जातिय समीकरण की परिधि में होगा ताकि उस जाति का सभी आठों सीटों पर प्रभावी लाभ मिल सके.

भाजपा में बदलेंगे आधे चेहरे

सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यही सबसे बड़ी मुश्किल है कि सरकार से जनता की स्वाभाविक नाराजगी के चलते अजमेर से सभी आठों सीटों पर अथवा कमोवेश आधे चेहरे बदले जाएं पर जातियों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ ना हो. कांग्रेस के लिए कोई समस्या नहीं है वह किसी भी जाति का प्रयोग किसी भी सीट से करने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि अजमेर में उसके पास खोने को कुछ नहीं है लेकिन दिखाने को बहुत कुछ है, यह कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट एवं भाजपा राज में कांग्रेस के सांसद चुने गए डाॅ. रघु शर्मा के संसदीय क्षेत्र अजमेर में कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहा. मौटे तौर पर देखा जाए तो अजमेर में भाजपा जहां अजमेर उत्तर और किशनगढ़ सीट में से किसी एक सीट पर तथा ब्यावर, केकड़ी और नसीराबाद सीट पर चेहरा बदल प्रयोग कर सकती है. अजमेर उत्तर में भाजपा को सिंधी ही उम्मीदवार चेहरा बदलने के लिए चाहिए तो वह संघनिष्ठ हो यह भी प्राथमिकता से देखा जा रहा है. जातिय आधार पर भाजपा के पास छेड़छाड़ की गंुजाइश नहीं है, फिर भी वोटों को साधना है और मत ध्रुवीकरण को रोकना है तो एक सीट सिंधी और वैश्य समाज व एक सीट पर गुर्जर युवा को मौका दिया जा सकता है. ऐसे में रावत और जाट समुदाय को थोड़ा संयम समझौता करना पड़ सकता है. यहां बता दें अजमेर उत्तर से शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री वासुदेव देवनानी विधायक हैं तो किशनगढ़ से भागीरथ चौधरी, केकड़ी से संसदीय सचिव शत्रुध्न गौतम विधायक हैं तो ब्यावर से शंकर सिंह रावत. नसीराबाद सीट उपचुनाव में कांग्रेस के रामनारायण गुर्जर के पास चली गई थी यहां से भाजपा के पूर्व सांसद व केंद्रीय मंत्री सांवर लाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा चुनाव हार गए थे. भाजपा इस सीट को फिर से जीतना चाहती है तो कांग्रेस कायम बनाए रखना.

कांग्रेस के पास जातिय तुष्टिकरण को खुला मैदान

कांग्रेस के पास जातिय तुष्टिकरण के लिए खुला मैदान है. कांग्रेस किशनगढ़ और ब्यावर में से किसी एक पर वैश्य को, मसूदा व पुष्कर में से किसी एक पर मुस्लिम को, नसीराबाद से गुर्जर को, अजमेर उत्तर, केकड़ी और मसूदा में से किसी एक पर राजपूत को, अजमेर दक्षिण से एससी कोली अथवा रेगर को, केकड़ी से ब्राह्मण तो मसूदा से राजपूत को अवसर देती है और किशनगढ़ शहर से वैश्य या जाट को चेहरा बनाती है तो इस बार प्लस में रहने के आसार हैं.

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