Wednesday , 14 November 2018

निशा जात्रा में दी जाएगी 11 बकरों की एकसाथ बलि

जगदलपुर, 16 अक्टूबर (उदयपुर किरण). बस्तर दशहरा के रस्मों में अश्विन अष्टमी व नवमी यानि 17 अक्टूबर दिन बुधवार को रथ परिक्रमा नहीं होती, वहीं देवियों को प्रसन्न करने केे लिए निशा जात्रा पर बकरों के अलावा कुम्हड़ा और मछली की बलि दी जाती है. दशहरा के दौरान सप्तमी तक रथ परिक्रमा के बाद अष्टमी व नवमी को रथ परिचालन विधान नहीं होता.

अश्विन अष्टमी की आधी रात अनुपमा चौक के समीप निशा जात्रा मंदिर में 11 बकरों की बलि दी जाती है. इस रस्म में बलि चढ़ाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है. जिससे कि देवी राज्य कि रक्षा बुरी प्रेतात्माओं से कर सके. मावली माता मंदिर में दो, राजमहल के सिहंड्योढ़ी में दो, काली मंदिर में एक बकरे की बलि दी जाती है, जबकि दंतेश्वरी मंदिर में एक काले कबूतर और सात मोंगरी मछलियों की बलि दी जाएगी.

पहले दी जाती थी हजारों भैसों की बलि

रस्म कि शुरुआत 1301 ईसवीं में की गई थी. इस तांत्रिक रस्म को राजा महाराजा बुरी प्रेत आत्माओं से राज्य कि रक्षा के लिए अदा करते थे. इस रस्म में बलि चढ़ाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है. जिससे कि देवी राज्य कि रक्षा बुरी प्रेत आत्माओं से कर सके. निशा जात्रा कि यह रस्म बस्तर के इतिहास में बहुत ह़ी महत्वपूर्ण स्थान रखती है. बस्तर के राजकुमार कमलचंद भंजदेव का कहना है कि समय के साथ इस रस्म में बदलाव आया है. पहले इस रस्म में कई हजार भैंसों कि बलि के साथ-साथ नर बलि भी दी जाती थी.

इस रस्म को बुरी आत्माओं से राज्य कि रक्षा के लिए अदा किया जता था. अब इस रस्म को राज्य में शान्ति बनाए रखने के लिए निभाया जाता है. वहीं इस अनोखी रस्म को देखने देश-विदेश से भारी संख्या में पर्यटक आते है. समय के साथ आज भारत के अधिकतर इलाकों कि परम्परा खत्म होती जा रही है. लेकिन बस्तर दशहरे की यह परंपरा यूं ही लगातार चली आ रही है.

http://udaipurkiran.in/hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*