Thursday , 20 June 2019

विश्व का अलौकिक पर्वत जिसके दर्शन से होती है ‘मनोकामनाएं पूर्ण’

kammdgiri parvat
  • भगवान श्रीराम के वरदान ने बढा दी कामदगिरि पर्वत की महिमा
  • प्रतिवर्ष करोडों श्रद्धालु लगाते है कामदगिरि की परिक्रमा

चित्रकूट. विंध्य पर्वत श्रृंखला के मध्य स्थित भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट के कामदगिरि पर्वत का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समूचे विश्व में विशेष महत्व है. मान्यता है कि इस पर्वत की ​परिक्रमा करने मात्र से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

श्रीराम ने कामदगिरि होने का वरदान दिया

इसी पवित्र धाम पर पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ वनवासकाल का सर्वाधिक साढ़े 11 वर्ष का समय व्यतीत करने वाले मर्यादा पुरूषोत्तम प्रभु श्रीराम ने पर्वतराज सुमेरू के शिखर कहे जाने वाले चित्रकूट गिरि को कामदगिरि होने का वरदान दिया था.

परिक्रमा करने से मनोकामनाएं होती हैं पूर्ण

ये विश्व का ऐसा अलौकिक पर्वत है. जिसके अवलोकन मात्र से ही व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती है. संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में कामदगिरि पर्वत की महिमा का बखान करते हुए लिखा है कि ‘कामद भे गिरि राम प्रसादा,अवलोकत अपहरत विसादा’
प्रभु श्रीराम के इसी वरदान की महिमा के कारण प्रतिवर्ष देश भर से करोड़ों श्रद्धालु चित्रकूट पहुंचकर मंदाकिनी नदी में स्नान करने के बाद मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कामदगिरि पर्वत की पंचकोसीय परिक्रमा लगाते हैं

इसी पर्वत पर श्रीराम ने बिताये साढ़े 11 वर्ष

धर्म नगरी चित्रकूट अनादि काल से अत्रि,वाल्मीकि समेत तमाम प्रख्यात ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है. त्रेता युग में जब अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम मां सीता और भ्राता लक्ष्मण सहित 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले थे. तब उन्होंने आद्य ऋषि वाल्मीकि से पूछा था कि साधना के लिए उत्तम स्थान कहां है और हमें कहां निवास करना चाहिए.

जिसके जवाब में वाल्मीकि ऋषि ने कहा था कि आप तीनों चित्रकूट गिरी जायें. वहां आपका सभी तरह से कल्याण होगा. ऋषि वाल्मीकि की आज्ञा पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट पहुंच गये और चित्रकूटगिरी पर निवास करने लगे. चित्रकूट के इसी पावन स्थल पर भगवान राम ने अपने वनवास के 14 वर्ष में से साढ़े 11 वर्ष बिताये थे.

रावण को वध करने की मिली शक्ति

जब श्रीराम चित्रकूट पर्वत पर निवास करते थे तो इसी पावन स्थल पर प्रभु राम का दरबार लगता था और श्रीराम भक्तों का कल्याण करते थे. चित्रकूट पर्वत ही वो स्थान है जहां भगवान राम ने तप कर रावण का वध करने के लिए विशेष शक्ति को प्राप्त किया था.

जब भगवान श्रीराम चित्रकूट को छोड़कर जाने लगे तो चित्रकूट गिरी ने भगवान राम से याचना किया कि हे प्रभु आपने इतने वर्षो तक यहां वास किया.जिससे ये जगह पावन हो गई लेकिन आपके जाने के बाद मुझे कौन पूछेगा. तब प्रभु श्रीराम ने चित्रकूटगिरि को वरदान दिया कि अब आप कामद हो जाएंगे. यानि इच्छाओं (मनोकामनाओं) की पूर्ति करने वाले हो जायेंगें.

जो भी आपकी शरण में आयेगा उसके सारे विशाद नष्ट होने के साथ-साथ सारी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी और उस पर सदैव राम की कृपा बनी रहेगी. जैसे प्रभु राम ने चित्रकूट गिरि को अपनी कृपा का पात्र बनाया ‘कामदगिरी पर्वत’ ‘कामतानाथ’ बन गये.

ब्रह्म,विष्णु और महेश तीनों देव का निवास

कामदगिरि प्रमुख द्वार के संत स्वामी मदन गोपाल दास भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि चित्रकूट आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था का सर्वश्रेष्ठ केंद्र है. ये वो भूमि है जहां पर ब्रह्म,विष्णु और महेश तीनों देव का निवास है.
भगवान विष्णु ने श्री राम रूप में यहां वनवास काटा था तो ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए यहां यज्ञ किया था और उस यज्ञ से प्रगट हुआ शिवलिंग धर्मनगरी चित्रकूट के क्षेत्रपाल के रूप में आज भी विराजमान हैं.

श्रीराम ने अन्याय व अत्याचार का संकल्प लिया

कामदगिरि प्राचीन द्वार के प्रधान पुजारी भरतशरण दास महाराज का कहना है कि धर्म नगरी के प्रमुख तीर्थ स्थल कामदगिरि पर्वत पर रहकर ही प्रभु राम ने तप-साधना कर शक्ति का संचय करने के साथ-साथ अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प लिया था.
भगवान श्रीराम के वरदान से कामदगिरि बने चित्रकूट गिरि आज भी देश भर से अमावस्या आदि मेलों पर आने वाले श्रद्धालुओं की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है.

चित्रकेतु ऋषि के नाम से चित्रकूट गिरि पड़ा

इस दिव्यधाम को लेकर प्रचलित मान्यता का बखान करते हुए गायत्री शक्ति पीठ के महंत डा.राम नारायण त्रिपाठी बताते हैं कि वायु पुराण में चित्रकूट गिरि की महिमा का उल्लेख है. सुमेरू पर्वत के बढ़ते अहंकार को नष्ट करने के लिए वायु देवता उसके मस्तक को उड़ा कर चल दिये थे.
उस शिखर पर चित्रकेतु ऋषि तप कर रहे थे. श्राप के डर से वायु देवता पुनः उस शिखर को सुमेरू पर्वत में स्थापित करने के लिए चलने लगे. तभी ऋषिराज ने कहा कि मुझे इससे उपयुक्त स्थल पर ले चलो नहीं तो श्राप दे दूंगा.

सम्पूर्ण भूमंडल में वायु देवता उस शिखर हो लेकर घूमते रहे,जब इस भूखंड पर आये तो ऋषि ने कहा कि इस शिखर को यहीं स्थापित करों. चित्रकेतु ऋषि के नाम से ही इस शिखर को नाम चित्रकूट गिरि पड़ा था.

कामदगिरि पर्वत के चार द्वार

डा.रामनारायण त्रिपाठी बताते है कि धनुषाकार कामदगिरि पर्वत के चार द्वार हैं. जिसमें उत्तरद्वार पर कुबेर, दक्षिणीद्वार पर धर्मराज,पूर्वी द्वार पर इंद्र और पश्चिमी द्वार पर वरूण देव द्वारपाल है.

कामदगिरि पर्वत के नीचे क्षीरसागर

कामदगिरि पर्वत के नीचे क्षीरसागर है. जिसके अंदर उठने वाले ज्वार-भाटा से कभी-कभार कामतानाथ भगवान के मुखार बिंद से दूध की धारा प्रवाहित होती है. विविध विशेषताओं के कारण ही कामदगिरि पर्वत के दर्शन और परिक्रमा के लिए प्रत्येक माह अमावस्या पर लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है. दीपदान मेले में यह संख्या 35 से 40 लाख तक पहुंच जाती है.

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