फायर सेफ्टी का अभाव : डूंगरपुर के अस्पताल बन गए घातक जाल
योगेंद्र सिंह राठौड़
डूंगरपुर ( पुकार). भारत में अस्पतालों की अग्नि सुरक्षा को लेकर हाल के दिनों में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. जयपुर के एसएमएस अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में आग लगने की घटना के बाद जहां प्रशासन और न्यायपालिका हरकत में आई है, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि डूंगरपुर जिले में आज भी दर्जनों सरकारी व निजी अस्पताल बिना फायर एनओसी के धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं. यह स्थिति सीधे-सीधे आमजन की जान को जोखिम में डालने वाली है.
सरकारी अस्पताल भी नियमों से ऊपर ?
डूंगरपुर जिले के अधिकांश पीएचसी और सीएचसी अस्पतालों के पास आज तक फायर एनओसी नहीं है. जिला मुख्यालय स्थित कुछ गिने-चुने संस्थानों को छोड़ दिया जाए तो लगभग पूरा स्वास्थ्य ढांचा बिना अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र के चल रहा है.
चौंकाने वाली बात यह है कि भूमि से संबंधित दस्तावेजों और फायर एनओसी के लिए आवश्यक कागजातों के अभाव को बहाना बनाकर वर्षों से इन अस्पतालों को बिना अनुमति संचालित किया जा रहा है.
मरीजों की जान भगवान भरोसे :
इन अस्पतालों में प्रतिदिन सैकड़ों गर्भवती महिलाएं, नवजात शिशु, बुजुर्ग और गंभीर रोगी इलाज के लिए आते हैं. यदि किसी अस्पताल में आग जैसी आपात स्थिति उत्पन्न होती है, तो न तो वहां पर्याप्त फायर सेफ्टी उपकरण हैं, न ही प्रशिक्षित स्टाफ. ऐसे में सवाल उठता है क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है ?
निजी अस्पतालों पर भी मेहरबानी क्यों ?
स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब निजी अस्पतालों की बात आती है. जिले में कई निजी अस्पताल बिना फायर एनओसी के नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं, लेकिन उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई न के बराबर है. कानून सभी के लिए समान है, फिर निजी अस्पतालों को यह छूट किस आधार पर दी जा रही है ?
कानून और न्यायपालिका की सख्ती :
कानून स्पष्ट है हर सार्वजनिक और व्यावसायिक इमारत के लिए फायर एनओसी अनिवार्य है और उसका समय-समय पर नवीनीकरण जरूरी है.
राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया जाना इस बात का प्रमाण है कि मामला कितना गंभीर है. इसके बावजूद डूंगरपुर में हालात जस के तस बने हुए हैं.
जिम्मेदार कौन ?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कल को कोई बड़ा हादसा होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा—
* स्वास्थ्य विभाग ?
* जिला प्रशासन ?
* दमकल विभाग ?
या फिर हमेशा की तरह फाइलों में जांच और मुआवजे की औपचारिकता ?
आमजन की सुरक्षा सर्वोपरि :
* अब समय आ गया है कि बिना फायर एनओसी चल रहे सरकारी व निजी अस्पतालों पर तत्काल कार्रवाई हो .
* अग्नि सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराया जाए .
* ऐसे संस्थानों में मरीजों का इलाज रोका जाए, जब तक वे पूरी तरह सुरक्षित न हों .
क्योंकि इलाज के नाम पर अगर जान ही खतरे में हो, तो ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठना लाज़मी है. लिए समान है, फिर निजी अस्पतालों को यह छूट किस आधार पर दी जा रही है ?
