कार्रवाई के बाद भी फिर खुल गया आनंद दवाखाना :
विभाग की नरमी से बढ़ा मनोबल – लापरवाही पर उठे तीखे सवाल ?
योगेन्द्र सिंह राठौड़
डूंगरपुर (पुकार).
पिछले सप्ताह स्वास्थ्य विभाग की आकस्मिक कार्रवाई के बाद बंद दिखाया जाने वाला आनंद दवाखाना अब दोबारा खुल गया है. शिकायतों के अनुसार अस्पताल बिना वैध लाइसेंस और अधूरे दस्तावेज़ों के संचालन पर जांच के दायरे में आया था. विभाग द्वारा संचालक को दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए 15 दिनों का समय दिया गया था, परंतु इससे पहले ही दवाखाना फिर कार्यरत दिखाई देने लगा.
स्थानीय नागरिकों ने चिकित्सा एवं पुलिस प्रशासन की कार्रवाई को ‘नक़ारा और अधूरी’ बताते हुए कड़ी नाराज़गी जताई है. लोगों का कहना है कि बिना कानूनी औपचारिकताओं के दोबारा खोलना यह संकेत देता है कि नियमों का पालन करवाने में गंभीर चूक बरती जा रही है.
जनआक्रोश : यदि आज अनदेखी हुई, तो कल जान जाएगी !
जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों व क्षेत्रवासियों का कहना है कि शहर के बीचोंबीच शिकायतों के घेरे में रहा संस्थान दोबारा संचालित है यह स्थिति विभागीय लापरवाही और कमजोर निगरानी को उजागर करती है. शिकायतें कई वर्षों से आती रही हैं, लेकिन अब तक नियमित जांच और कड़ी कार्रवाई नहीं हुई. लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर शहर के बीचों-बीच ऐसा संभव है, तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुरक्षा की स्थिति कितनी गंभीर होगी.
भू-स्वामी के अस्पताल भवन खाली करवाने के निर्देश भी कथित रूप से दरकिनार
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल भवन के मालिक को भी प्रशासन ने परिसर खाली करवाने के निर्देश दिए थे. बावजूद इसके, अस्पताल का संचालन जारी है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस और चिकित्सा विभाग की कार्रवाई पूरी तरह नाकारा साबित हुई.
अवैध संचालन के आरोपों पर विभाग की धीमी कार्रवाई पर सवाल
बिना लाइसेंस और अधूरी मंजूरी वाले अस्पतालों का संचालक केवल दोषी नहीं, बल्कि उन अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है जिन्होंने लंबे समय तक नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं किया. उनका कहना है कि विभागीय उदासीनता ने ऐसे संस्थानों के संचालकों के मनोबल को बढ़ाया है, जिससे आमजन की जान जोखिम में पड़ती है. जब कार्रवाई केवल नोटिस तक सीमित रहेगी, तब जनजीवन का जोखिम बढ़ता ही जाएगा. लोगों ने यह भी आशंका जताई कि यदि शहर में इस प्रकार के संस्थान सक्रिय हों तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुरक्षा की स्थिति और अधिक चिंताजनक हो सकती है.
आमजन की जान की कीमत क्या सिर्फ़ कागज़ों में दर्ज चेतावनी है ?
नागरिकों ने चेतावनी दी है कि अगर स्वास्थ्य विभाग ने तुरंत कार्रवाई नहीं की, तो ऐसे अस्पतालों के कारण गंभीर हादसे होने की संभावना बढ़ जाएगी. लोगों की मांग है कि या तो अस्पताल को सील किया जाए, या फिर संचालक सभी दस्तावेज़ों और अनुमतियों के साथ स्पष्ट प्रमाण पेश करें.
जांच हो रही है, या सिर्फ़ दिखावा ?
डूंगरपुर में यह मामला अब जनहित और स्वास्थ्य सुरक्षा की बड़ी चिंता बन चुका है. आमजन और सामाजिक संगठन लगातार प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि कार्रवाई केवल नोटिस तक सीमित न रह जाए, बल्कि सख्त और पारदर्शी जांच की जाए ताकि भविष्य में किसी भी मरीज की जान से खिलवाड़ न हो.
सार्वजनिक चर्चाओं में लगातार सवाल उठ रहे हैं कि
– क्या नियमों का उल्लंघन करने वालों का मनोबल विभागीय अनदेखी से और बुलंद हो रहा है?
– क्या प्रशासन केवल शिकायत आने पर ही जागता है?
– क्या कार्रवाई के नाम पर सिर्फ़ नोटिस, और फिर मौन-स्वीकृति?
क्यों जरूरी है तत्काल और कठोर कार्रवाई
स्वास्थ्य सुरक्षा सीधे जीवन के अधिकार से जुड़ी है. ऐसे में तथ्यों की पारदर्शी जांच, दस्तावेज़ सत्यापन में त्वरित निर्णय, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही समय की मांग है. नागरिकों की स्पष्ट मांग या तो नियम लागू करिए वरना आमजन की जान से न खेला जाए !
