बिना ग्रामसभा, बिना सहमति—फर्जी दस्तावेज़ों से आदिवासी भूमि अधिग्रहण का खेल बेनकाब

आईटीआई रामसागड़ा में स्वीकृत, निर्माण जालुकुआ में — राजनीतिक दबाव का खेल
योगेंद्र सिंह राठौड़ 
डूंगरपुर (पुकार). बिछीवाड़ा उपखंड के जालुकुआ क्षेत्र में आईटीआई भवन निर्माण को लेकर बड़ा मामला सामने आया है, जहाँ आदिवासी काश्तकार की काश्त-कब्जे की जमीन पर फर्जी कोरम बैठक और जाली हस्ताक्षरों के आधार पर एनओसी जारी करने का आरोप लगा है. आदिवासी जनाधिकार एकामंच राजस्थान और सामाजिक कार्यकर्ता यशवंत कुमार ने इस पूरे प्रकरण को उजागर करते हुए बताया कि आईटीआई की मूल स्वीकृति रामसागड़ा गांव की खाली सरकारी भूमि पर हुई थी, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों की साजिश के चलते खसरा नंबर बदलकर निर्माण स्थल को जालुकुआ मौजा में स्थानांतरित कर दिया गया.
ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन को आईटीआई के लिए चुना गया, वह आदिवासी काश्तकार की पुश्तैनी भूमि है, जिस पर न केवल उनका मकान बना हुआ है बल्कि वे दशकों से खेती करते आ रहे हैं. खसरा नंबर 568, 571 और 577 पर स्थित यह जमीन परिवार की एकमात्र आजीविका का साधन है. इसके बावजूद ग्राम पंचायत जालुकुआ की तत्कालीन सरपंच सविता देवी और सचिव मगनाराम अहारी ने कथित रूप से कोरम बैठक दिखाकर, वार्ड पंचों के नकली हस्ताक्षर करवा कर एनओसी जारी कर दी, जबकि वास्तविक पंचों का कहना है कि उन्हें किसी बैठक की जानकारी नहीं दी गई.
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि पूरी प्रक्रिया राजस्व अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं की मिलीभगत से संचालित की गई. ग्राम सभा की अनुमति लिए बिना भूमि परिवर्तन की कार्रवाई शुरू कर दी गई, जो पंचायती राज नियमों का खुला उल्लंघन है. काश्तकार परिवार ने बताया कि उनके पास इस जमीन से जुड़े वैध राजस्व रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, फिर भी उन्हें जबरन बेदखल करने का प्रयास किया जा रहा है.
इस घटनाक्रम के विरोध में ग्रामीणों ने एसडीएम बिछीवाड़ा, जिला कलेक्टर और अन्य अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर जांच की मांग उठाई है. सरपंच और सचिव के खिलाफ 15 दिन पूर्व दर्ज करवाए गए परिवाद पर भी पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है, जिस पर ग्रामीणों ने नाराजगी जताई है. ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आईटीआई निर्माण से आपत्ति नहीं है, लेकिन निर्माण वहीँ हो जहाँ पहले स्वीकृति दी गई थी, न कि उस भूमि पर जहाँ वर्षों से खेती की जा रही है. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे.