एसआईआर सर्वे से हड़कंप : फर्जी टीएसपी प्रमाणपत्र पर सरकारी नौकरी! आयोग सख्त

भरतपुर निवासी बन गए टीएसपी मूलनिवासी ! नौकरी में घुसपैठ का संगीन मामला
तहसीलदार–पटवारी–शिक्षक परिवार की कथित मिलीभगत उजागर

योगेंद्र सिंह राठौड़

डूंगरपुर (पुकार). टीएसपी क्षेत्र में सरकारी नौकरियों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. आरोप है कि तहसील कार्यालय, पटवारी स्तर के राजस्व कर्मचारियों और एक प्रभावशाली शिक्षक परिवार की कथित मिलीभगत से फर्जी टीएसपी मूलनिवास प्रमाणपत्र जारी कर शिक्षकों की नियुक्ति कराई गई. मामले ने आदिवासी क्षेत्र में नौकरी की पारदर्शिता, आरक्षण हक और प्रशासनिक ईमानदारी पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं.
प्राप्त दस्तावेज़ों से पता चला है कि सेवा–निवृत्त कलूवाराम दुशेष और उनका परिवार वर्ष 2002 में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान भरतपुर जिले की मतदाता सूची में दर्ज था. इसके बावजूद कलूवाराम के पुत्र लोकेन्द्र दुशेष (2018) और सुनील दुशेष (2022) को डूंगरपुर टीएसपी क्षेत्र का विशेष मूलनिवास प्रमाणपत्र जारी कर अध्यापक पद पर नियुक्त किया गया. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि भरतपुर निवासी होने के बावजूद उन्हें टीएसपी क्षेत्र की सरकारी नौकरी कैसे मिली?


दस्तावेजों में यह स्पष्ट है कि मतदाता सूची में परिवार का नाम भाग संख्या 56, विधानसभा क्षेत्र नदबई, मकान संख्या 10 पर क्रम संख्या 42, 43 और 44 पर दर्ज था. इसी के साथ एपिक नंबर, पैतृक भूमि की खाता संख्या 52, राशन कार्ड और शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड भी भरतपुर निवासी होने की पुष्टि करते हैं. इन प्रमाणों से परिवार का मूल निवास निर्विवाद रूप से भरतपुर जिले का साबित होता है.

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसे ठोस रिकॉर्ड होने के बावजूद चिखली तहसील ने टीएसपी मूलनिवास प्रमाणपत्र कैसे जारी कर दिया. सुचना का अधिकार में पूछे गए सवालों पर तहसील की ओर से कभी धारा 8(जे) का हवाला देकर जानकारी रोकी गई और कभी उल्टा आवेदक से ही पूछा गया कि “मूलनिवास किस वर्ष जारी हुआ?” जबकि कानून कहता है कि प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारी को यह बताना जरूरी है कि प्रमाणपत्र किन दस्तावेजों के आधार पर जारी हुआ. यह रवैया जांच को प्रभावित करने और तथ्य छिपाने जैसा माना जा रहा है.


कानूनी रूप से किसी भी टीएसपी प्रमाणपत्र को जारी करने से पहले संबंधित तहसील को यह सुनिश्चित करना होता है कि परिवार 1 जनवरी 1970 से पूर्व टीएसपी क्षेत्र में निवास करता था. उदाहरण के रूप में मतदाता सूची, भूमि अभिलेख, राशन कार्ड, बस्ती रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य होता है. राजस्थान सरकार की भर्ती अधिसूचनाएं भी साफ कहती हैं कि टीएसपी क्षेत्र में नौकरी वही ले सकता है जिसका परिवार 1970 से पहले से वहीं पंजीकृत हो. ऐसे में भरतपुर निवासी को टीएसपी मूलनिवास जारी कर नियुक्ति देना स्पष्ट रूप से नियमविरुद्ध और गंभीर प्रशासनिक चूक माना जा रहा है.

राजस्थान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले भी यह स्थापित कर चुके हैं कि टीएसपी प्रमाणपत्र पहचान या जाति से नहीं मिलता, बल्कि पूर्वजों के ऐतिहासिक निवास पर आधारित होता है. गलत आधार पर जारी मूलनिवास प्रमाणपत्र रद्द किया जा सकता है, और यदि उस पर नौकरी मिली हो तो नियुक्ति भी खारिज की जा सकती है. इतना ही नहीं, प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारी पर दंडात्मक और विभागीय कार्रवाई भी हो सकती है.

इस पूरे मामले ने आदिवासी क्षेत्र में सरकारी नौकरियों पर अवैध घुसपैठ को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने राजस्थान सरकार के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और जिला कलेक्टर से मांग की है कि टीएसपी क्षेत्र में जारी फर्जी मूलनिवास प्रमाणपत्रों की जांच की जाए, गलत प्रमाणपत्र जारी करने वाले तहसील अधिकारियों पर कार्रवाई हो और शिक्षा विभाग में नियुक्ति प्रक्रिया की जवाबदेही तय की जाए. ग्रामीण और जनजातीय संगठनों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों पर सख्ती नहीं हुई तो योग्य आदिवासी अभ्यर्थियों के अधिकार लगातार हनन होते रहेंगे.